रविवार, 30 जून 2019

गायत्री मंत्र क्यों और कब जरूरी है (भाग 2)

*गायत्री मंत्र क्यों और कब ज़रूरी है*


*☀सुबह उठते वक़्त 8 बार ❕✋✌👆❕अष्ट कर्मों को जीतने के लिए !!*


*🍚🍜 भोजन के समय 1 बार❕👆❕ अमृत समान भोजन प्राप्त होने के लिए  !!*                 


*🚶 बाहर जाते समय 3 बार ❕✌👆❕समृद्धि सफलता और सिद्धि के लिए    !!*


 *👏 मन्दिर में 12 बार ❕👐✌*

*प्रभु के गुणों को याद करने के लिए !!* 


*😢छींक आए तब गायत्री मंत्र  उच्चारण ☝1 बार  अमंगल दूर करने के लिए !!*


*सोते समय  7 बार  ❕✋✌ ❕सात प्रकार के भय दूर करने के लिए !!*                             


 👏👏  !!!*

गायत्री मंत्र का अर्थ भाग 1

           गायत्री मंत्र का अर्थ

*ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।*

*यह मंत्र सूर्य देवता (सवितुर) के लिये प्रार्थना रूप से भी माना जाता है ।।*

*हे प्रभू! आप हमारे जीवन के दाता  हैं  आप हमारे दुख़ और दर्द का निवारण करने वाले हैं आप हमें सुख़ और शांति प्रदान करने वाले हैं ।।*

*हे संसार के विधाता हमें शक्ति दो कि हम आपकी ऊर्जा से शक्ति प्राप्त कर सकें ।।*

*कृपा करके हमारी बुद्धि को सही रास्ता दिखायें ।।*

*मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या गायत्री मंत्र के पहले नौं शब्द प्रभु के गुणों की व्याख्या करते हैं ।।*

*ॐ = प्रणव*

*भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाले*

*भुवः = दुख़ों का नाश करने वाले*

*स्वः = सुख़ प्रदान करने वाले*

*तत = वह,*

*सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल*

*वरेण्यं = सबसे उत्तम*

*भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाले*

*देवस्य = प्रभू*

*धीमहि = आत्म चिंतन के* *योग्य (ध्यान)*

*धियो = बुद्धि,*

*यो = जो,*

*नः = हमारी,*

*प्रचोदयात् = हमें शक्ति दे*

प्रेम की गंगा


                *घर-घर में बहे प्रेम की गंगा*


 🌷  रामनारायण व जयनारायण नाम के दो भाई रहते थे। उनकी एक छोटी बहन थी – प्रेमा। उनके माता-पिता स्वर्गवासी हो गये थे। बड़े भाई रामनारायण जमींदार थे और छोटे भाई जयनारायण वकील बन गये थे।*

*रामनारायण व प्रेमा सत्संग, कीर्तन, प्रभुभक्ति में रुचि रखते थे तथा जयनारायण पाश्चात्य जीवनशैली से प्रभावित थे। प्रेमा जब विवाह योग्य हुई तब दोनों भाई उसके लिए सुयोग्य वर खोजने लगे। रामनारायण धर्मनिष्ठ व सच्चरित्रवान वर खोजने लगे। इसी बात को लेकर दोनों भाइयों में मनमुटाव हो गया। जयनारायण ने घर छोड़ दिया और अपनी पत्नी को लेकर दूसरे मोहल्ले में रहने लगे। रामनारायण ने प्रेमा का विवाह एक सच्चरित्र युवक के साथ कर दिया।*

*समय बीता। एक दिन प्रेमा ससुराल से अपने बड़े भाई के घर आयी हुई थी। एक शाम को वह झूला झूल रही थी कि जयनारायण किसी कार्यवश उधर से गुजरे। प्रेमा की जयनारायण की तरफ पीठ थी इसलिए वह भाई को देख नहीं पायी परंतु उन्होंने बहन को देख लिया। वकील बाबू ने सुना कि प्रेमा गा रही हैः*

*भगीरथ की प्रभुप्रीति तपस्या, गंगा धरती पे लायी।*

*घर-घर में बहे प्रेम की गंगा, रहे न कोई दिल खाली।।*

*हर दिल बने मंदिर प्रभु का, यदि गुरुज्ञान ज्योति जगा ली।*

*मेरे भैया दोनों नारायण, मैं हूँ ईश्वर की लाड़ली।।*

*वकील बाबू ने सोचा, ʹजिसे मैंने भुला दिया था, वह मुझे अब भी स्मरण कर रही है !ʹ*

*बात हृदय को चोट कर गयी। वे बहन और भाई के लिए तड़पने लगे। आखिर संस्कारी खानदान का खून रगों में था ! अपनी भूल के लिए पश्चाताप करते हुए जयनारायण उदास रहने लगे। खाने पीने से भी उनकी वृत्ति हट गयी। उद्विग्नता अत्यंत बढ़ने के कारण एक दिन उन्हें तेज बुखार हो गया।*

*एक हफ्ते बाद प्रेमा ने सुना कि जयनारायण बहुत बीमार हैं। वह बड़े भाई के कमरे में गयी और बोलीः "छोटे भैया बहुत बीमार हैं।"*

*"मुझे पता है तुम उससे मिलने जाना चाहती हो लेकिन प्रेमा ! वहाँ तुम्हें व्यर्थ ही अपमानित होना पड़ेगा यह पहले ही समझ लेना।"*

*"भैया ! मान-अपमान आया-जाया करता है पर अपनी संस्कृति का ʹहृदय की विशालताʹ व मिल-जुलकर रहने का सिद्धान्त शाश्वत है। आप ही तो गाया करते हैं-*

*सत्य बोलें झूठ त्यागें मेल आपस में करें।*

*दिव्य जीवन हो हमारा यश 1 ʹतेराʹ  गाया करें।।"*

*1.    प्रभु का*

*"शाबाश ! तुम्हारे विचारों की सुवास जयनारायण के घर को भी महकायेगी।"*

*जयनारायण के घर पहुँचकर प्रेमा ने देखा कि वे पलंग पर बेहोश पड़े हैं। एक ओर रमा भाभी खड़ी है व दूसरी ओर डॉक्टर खड़े हैं।*

*डॉक्टरः "इनके शरीर में रक्त की बहुत कमी हो गयी है, नसें तक दिखायी दे रही हैं।"*

*रमाः "कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं। कभी-कभी बस इतना ही कह उठते हैं- मेरे भैया दोनों नारायण, मैं हूँ ईश्वर की लाड़ली।।"*

*"यह सन्निपात का लक्षण है।"*

*"डॉक्टर साहब ! मेरे पास जो कुछ है सब ले लीजिये परंतु इनके प्राण बचा लीजिये।"*

*"प्राण बचाना परमात्मा के हाथ में है। डॉक्टर का काम कोशिश करना है। इन्हें तत्काल खून चढ़ाना पड़ेगा।"*

*"मेरा खून ले लीजिये।"*

*"आप गर्भवती हैं, आपका खून लेना ठीक नहीं।"*

*"डॉक्टर साहब ! मैं स्वस्थ हूँ, मेरा खून ले लीजिये !" – दरवाजे में खड़ी प्रेमा बोल उठी।*

*रमाः "नहीं प्रेमा ! आप रहने दीजिये।"*

*"क्यों भाभी ?"*

*"हमने आपसे बहुत गलत व्यवहार किया है। आपकी शादी में भी हम लोग शामिल नहीं हुए थे और एक पैसा भी हमने खर्च नहीं किया। आप हमसे नाराज नहीं हैं ?"*

*"बहन का आदर्श यह नहीं है कि वह किसी भूल के कारण अपने भाई से सदा के लिए नाराज हो जाय। मेरे गुरुदेव कहते हैं-*

*बीत गयी सो बीत गयी, तकदीर का शिकवा कौन करे।*

*जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन करे।।"*

*डॉक्टर ने प्रेमा का रक्त समूह जाँचकर खून ले लिया और वकील साहब को चढ़ा दिया।*

*एक हफ्ते में ही जयनारायण स्वस्थ हो गये। वे रामनारायण के घर आये। तब प्रेमा वहीं थी। जयनारायण ने बड़े भाई के चरणों पर अपना सिर रख दिया व सिसक-सिसक कर रोने लगे। रामनारायण ने उन्हें उठाया और छाती से लगा लिया। सभी की आँखों से प्रेमाश्रु बरसने लगे।*

*"भाई साहब ! मुझे क्षमा कर दीजिये। मुझे अपने घर में रहने की अनुमति दीजिये।"*

*"अनुमति ?.... यह तुम्हारा ही घर है।"*

*"भैया ! आप पिताजी के समान हैं। आपने मुझे पढ़ाया-लिखाया, योग्य बनाया है और मैंने...."*

*"दुःखी मत होओ। सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते। तुम आज ही यहाँ आ जाओ।"*

*"प्रेमा ! मेरी हिम्मत नहीं होती कि तुम्हारी नजर से नजर मिला सकूँ। मैं भाई का आदर्श भूल गया परंतु तुम बहन का आदर्श नहीं भूली।"*

*"हिंदू संस्कृति व संतों के अऩुसार बहन का जो आदर्श है, उसी का मैंने पालन किया है। यह तो मेरा कर्तव्य ही था। यदि तारीफ करनी ही है तो मेरी नहीं, अपनी संस्कृति व संतों की करो।"*

*दूसरे दिन जयनारायण अपनी पत्नीसहित उस घर में लौट आये। सत्संग के संस्कारों ने, संस्कृति के आदर्शों ने टूटे हुए दिलों को प्रेम की डोर से जोड़ दिया।*

एक बार *मीठे हलवे की कटोरी* सामने आयी तो ऐसे ही ध्यान आया की इसमें *काजू, बादाम,सूजी* यह सब तो *दिखाई* दे रहे हैं पर जिस *चीज* से इसमें *मिठास* हैं वह *शक्कर* तो कही *नजर* ही नही आ रही हैं.....

ठीक ऐसे ही *हमारे जीवन में* भी कुछ *लोग* ऐसे होते हैं, जो *दिखाई नही देते* पर उनके *अपनेपन की मिठास* हमारे *जीवन* को हमेशा *आनंदित* करती रहती हैं.....!!!

     
🇨🇮 *हे भारत की धरा ! हे ऋषिभूमि ! तेरे कण-कण में अभी भी कितने पावन संस्कार हैं ! हे भारतवासियो ! हे दिव्य संस्कृति के सपूतो ! आप अपने महापुरुषों के स्नेह के, हृदय की विशालता के संस्कारों को मत भूलो। ये संस्कार घर-घर में, दिल-दिल में प्रेम की गंगा प्रकटाने का सामर्थ्य रखते हैं।*

एक अनोखा मुकदमा......

             💢एक अनोखा मुकदमा💢

न्यायालय  में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया |अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं|  मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था|
       एक 60 साल के  व्यक्ति ने ,अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था|
    मुकदमा कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता |मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है |
      मैं अभी ठीक हूं, सक्षम हू। इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।
        न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया| न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो|
    मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ |अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी  है या मैं  उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।
      छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से,जब से मै नौकरी मे बाहर हू  अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना  कर्तव्य कब पूरा करूँगा।जबकि आज मै स्थायी हूं,बेटा बहू सब है,तो मां भी चाहिए।
          परेशान  न्यायाधीश महोदय ने  सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला|
       आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है|
      मां कुल 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी |उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान  बराबर हैं| मैं किसी एक के  पक्ष में फैसला सुनाकर ,दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती|
 आप न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है |जो  आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।
             आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से  निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से  सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है| ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।
   फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा |
यह सब देख अदालत में मौजूद  न्यायाधीश समेत सभी के आंसू छलक पडे।
        कहने का  तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो|
   ये क्या बात है कि 'माँ तेरी है' की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं |यह पाप  है।
   धन दौलत गाडी बंगला सब होकर भी यदि मा बाप सुखी नही तो आप से बडा कोई जीरो(0)नही।

शुक्रवार, 28 जून 2019

हमारे हिन्दू धर्म का धार्मिक ज्ञान

*हिन्दू धर्म ज्ञान मंथन*✍

 *📖 हमारे चार वेद है।*
1] ऋग्वेद
2] सामवेद
3] अथर्ववेद
4] यजुर्वेद

*📜 कुल 6 शास्त्र है।*
1] वेदांग
2] सांख्य
3] निरूक्त
4] व्याकरण
5] योग
6] छंद

*⛲ हमारी 7 नदियां।*
1] गंगा
2] यमुना
3] गोदावरी
4] सरस्वती
5] नर्मदा
6] सिंधु
7] कावेरी

*📚 हमारे 18 पुराण।*
1] मत्स्य पुराण
2] मार्कण्डेय पुराण
3] भविष्य पुराण
4] भगवत पुराण
5] ब्रह्मांड पुराण
6] ब्रह्मवैवर्त पुराण
7] ब्रह्म पुराण
8] वामन पुराण
9] वराह पुराण
10] विष्णु पुराण
11] वायु पुराण
12] अग्नि पुराण
13] नारद पुराण
14] पद्म पुराण
15] लिंग पुराण
16] गरुड़ पुराण
17] कूर्म पुराण
18] स्कंद पुराण

*🍚 पंचामृत।*
1] दूध
2] दहीं
3] घी
4] मध
5] साकर

*🌌 पंचतत्व।*
1] पृथ्वी
2] जल
3] तेज
4] वायु
5] आकाश

*☘ तीन गुण।*
1] सत्व्
2] रज्
3] तम्

*🌀 तीन दोष।*
1] वात्
2] पित्त्
3] कफ

*🌁 तीन लोक।*
1] आकाश लोक
2] मृत्यु लोक
3] पाताल लोक

*🌊 सात महासागर।*
1] क्षीरसागर
2] दधिसागर
3] घृतसागर
4] मथानसागर
5] मधुसागर
6] मदिरासागर
7] लवणसागर

*🌅 सात द्वीप।*
1] जम्बू द्वीप
2] पलक्ष द्वीप
3] कुश द्वीप
4] पुष्कर द्वीप
5] शंकर द्वीप
6] कांच द्वीप
7] शालमाली द्वीप

*🗿 तीन देव।*
 1] ब्रह्मा
 2] विष्णु
 3] महेश

*🐋🐄🐍 तीन जीव।*
1] जलचर
2] नभचर
3] थलचर

*🚩 चार फल (पुरुषार्थ)।*
1] धर्म
2] अर्थ
3] काम
4] मोक्ष

*👺 चार शत्रु।*
1] काम
2] क्रोध
3] मोह
4] लोभ

*🏡 चार आश्रम।*
1] ब्रह्मचर्य
2] गृहस्थ
3] वानप्रस्थ
4] संन्यास

*💎 अष्टधातु।*
1] सोना
2] चांदी
3] तांबु
4] लोह
5] सीसु
6] कांस्य
7] पित्तल
8] रांगु

*👥 पंचदेव।*
1] ब्रह्मा
2] विष्णु
3] महेश
4] गणेश
5] सूर्य

*👁 चौदह रत्न।*
1] अमृत
2] अैरावत हाथी
3] कल्पवृक्ष
4] कौस्तुभ मणी
5] उच्चै:श्रवा अश्व
6] पांचजन्य शंख
7] चंद्रमा
8] धनुष
9] कामधेनु गाय
10] धनवंतरी
11] रंभा अप्सरा
12] लक्ष्मी माताजी
13] वारुणी
14] वृष

*🌹🙏🏻  नवधा भक्ति।*
1] श्रवण
2] कीर्तन
3] स्मरण
4] पादसेवन
5] अर्चना
6] वंदना
7] मित्र
8] दास्य
9] आत्मनिवेदन

*🌍 चौदह भुवन।*
1] तल
2] अतल
3] वितल
4] सुतल
5] रसातल
6] पाताल
7] भुवलोक
8] भुलोक
9] स्वर्ग
10] मृत्युलोक
11] यमलोक
12] वरुणलोक
13] सत्यलोक
14] ब्रह्मलोक.

जीवन का सत्य

*जीवन का सत्य*

*दिल में "बुराई" रखने से बेहतर है, कि "नाराजगी" जाहिर कर दो ।*

*जहाँ दूसरों को "समझाना" कठिन हो, वहाँ खुद को समझ लेना ही बेहतर है ।*

*"खुश" रहने का सीधा सा एक ही "मंत्र" है, कि "उम्मीद" अपने आप से रखो, किसी और से नहीं..!*
  ‼ *आपका दिन शुभ हो* ‼
        

*रामायण कथा का एक अंश*

*रामायण कथा का एक अंश*
जिससे हमे *सीख* मिलती है *"एहसास"* की...

*श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी !
की यकायक *श्री राम* के चरणों मे *कांटा* चुभ गया !

श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे !
बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी ?"

*धरती* बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"

प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात* मत करना"

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी *व्याकुलता* क्यों ?"

*श्री राम* बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा !"

*"हृदय विदीर्ण* !! ऐसा क्यों प्रभु ?",
*धरती माँ* जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!"

अर्थात
*रिश्ते* अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ *गहरी आत्मीयता* नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा* हो सकता है ।
🔰🔰
इसीलिए कहा गया है कि...
*रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार* से नही,
*मित्रता* से नही, *व्यवहार* से नही,
बल्कि...
सिर्फ और सिर्फ *आत्मीय "एहसास"* से ही बनते और *निर्वहन* किए जाते हैं।
जहाँ *एहसास* ही नहीं,
*आत्मीयता* ही नहीं ..
वहाँ *अपनापन* कहाँ से आएगा l
          🍃🍂🍃🍂🍃
*हम सबके लिए प्रेरणास्पद लघुकथा* ✍✍
     🕉🙏  🙏🌹🌹🕉

यथार्थ सत्य

यथार्थ सत्य 
*🙏🏻🌹🌹🙏🏻*

*अमूल्य संबंधों की तुलना कभी पैसों से मत कीजिये,*

*पैसे दो दिन काम आयेंगे, जबकि संबंध जिंदगी भर काम आयेंगे.*

*🙏🏻आपका दिन शुभ हो🙏🏻*

ॐ का उच्चारण क्यों और कब जरूरी है


*ॐ , ओउम् तीन अक्षरों से बना है।*

 *अ उ म् ।*

*"अ" का अर्थ है उत्पन्न होना,*


 *"उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास,*


*"म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना।*


*ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।*


*ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।*


*जानिए*


*ॐ कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक*

*और*

 *अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के उच्चारण का मार्ग...*


*1. ॐ और थायराॅयडः-*

 *ॐ का उच्‍चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।*


*2. ॐ और घबराहटः-*

 *अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।*


*3. ॐ और तनावः-*

 *यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।*


*4. ॐ और खून का प्रवाहः-*

 *यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।*


*5. ॐ और पाचनः-*

 *ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।*


*6. ॐ लाए स्फूर्तिः-*

 *इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।*


*7. ॐ और थकान:-*

 *थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।*


*8. ॐ और नींदः-*

 *नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।*


*9. ॐ और फेफड़े:-*

 *कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।*


*10. ॐ और रीढ़ की हड्डी:-*

 *ॐ के पहले शब्‍द का उच्‍चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।*


*11. ॐ दूर करे तनावः-*

 *ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।*


*आशा है आप अब कुछ समय जरुर ॐ का उच्चारण  करेंगे।*

*"पहला सुख निरोगी काया"*

*जय श्रीराम
पंडित तरूण दुवे विदिशा 

कर्म-भोग

*Ⓜ कर्म - भोग Ⓜ*

Ⓜ  पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता - पिता , भाई - बहन , पति - पत्नि , प्रेमी - प्रेमिका , मित्र - शत्रु , सगे - सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं , सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।

    Ⓜ    *सन्तान के रुप में कौन आता है ?*

Ⓜ  वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --

Ⓜ  *ऋणानुबन्ध  :-* पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो , वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा , जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

Ⓜ  *शत्रु पुत्र  :-* पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता - पिता से मारपीट , झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।

Ⓜ  *उदासीन पुत्र  :-* इस प्रकार की सन्तान ना तो माता - पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है । बस , उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने पर यह माता - पिता से अलग हो जाते हैं ।

Ⓜ  *सेवक पुत्र  :-* पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो  बोया है , वही तो काटोगे । अपने माँ - बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी , वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।

Ⓜ  आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा ।

Ⓜ  इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे , उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये ।

Ⓜ  ज़रा सोचिये , "आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये , वो कितना सोना - चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना - चाँदी , धन - दौलत बैंक में पड़ा रह गया , समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है , खुद ही खा - कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ , वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।"

Ⓜ  मैं , मेरा , तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा , कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ *नेकियाँ* ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके *नेकी* करो *सतकर्म* करो ।
                     *📙 श्रीमद्भभगवतगीता।*
     *जय श्री राधे कृष्णा*
 पंडित तरूण दुवे विदिशा 

ज्ञान की बातें....

ज्ञान की बातें......
*꧂ *अच्छे व्यक्ति* के
                  " साथ"
 संबंध, उस  *"गन्ने "* के    समान है--जिसे आप *तोड़ो :मरोड़ो :काटो या फिर कुचल दो*                         
           आपको उससे
   *मीठा रस*  ही मिलेगा
🌹🌹🌹
       🌸 🌸

रविवार, 23 जून 2019

सही कहाकिसी ने

सही कहा किसी ने ->
कौन हिसाब रखे
किसको कितना दिया
और कौन कितना बचायेगा

इसलिए ईश्वर ने आसान गणित लगाया

सबको खाली हाथ भेज दिया

खाली हाथ ही बुलायेगा| 

मंगलवार, 18 जून 2019

संतों ने भगवान से भक्ति क्यों मांगी

संतों ने भगवान से भक्ति क्यों  मांगी
सन्तोंने भगवान्‌से भक्ति माँगी है । अच्छे-अच्छे महात्मा पुरुषोंने भगवान्‌के चरणोंका प्रेम माँगा है‒

“जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥“

भगवान् शंकर माँगते हैं‒

“बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥“

तो उनके कौन-सी कमी रह गयी ? पर यह माँगना सकाम नहीं है । तीर्थ, दान आदि के जितने पुण्य हैं, उन सब का एक फल माँगे कि भगवान्‌ के चरणों में प्रीति हो जाय । हे नाथ ! आपके चरणों में प्रेम हो जाय, आकर्षण हो जाय । भगवान् हमें प्यारे लगें, मीठे लगें । यह कामना करो । यह कामना सांसारिक नहीं है ।

भगवान्‌ का नाम लेते हुए आनन्द मनाओ, प्रसन्न हो जाओ कि मुख में भगवान्‌ का नाम आ गया, हम तो निहाल हो गये ! आज तो भगवान्‌ ने विशेष कृपा कर दी, जो नाम मुख में आ गया । नहीं तो मेरे-जैसे के लिये भगवान्‌ का नाम कहाँ ? जिनके याद करने मात्र से मंगल हो जाय ऐसे जिस नाम को भगवान् शंकर जपते हैं‒

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती ।
सादर जपहु अनंग आराती ॥

वह नाम मिल जाय हमारे को । कलियुगी तो हम जीव और राम-नाम मिल जाय तो बस मौज हो गयी, भगवान्‌ ने विशेष ही कृपा कर दी । ऐसी सम्मति मिल गयी, हमारे को भगवान्‌ की याद आ गयी । भगवान्‌ की बात सुनने को मिली है; भगवान्‌की चर्चा मिली है, भगवान्‌ का नाम मिला है,भगवान्‌ की तरफ वृत्ति हो गयी है‒ऐसे समझकर खूब आनन्द मनावें, खूब खुशी मनावें, प्रसन्नता मनावें ।

एक बात और विलक्षण है ! उस पर आप ध्यान दें । बहुत ही लाभकी बात है, (६) जब कभी भगवान् अचानक याद आ जाये भगवान्‌ का नाम अचानक याद आ जाय,भगवान्‌ की लीला अचानक याद आ जाय, उस समय यह समझे कि भगवान् मेरे को याद करते हैं । भगवान्‌ ने अभी मेरे को याद किया है । नहीं तो मैंने उद्योग ही नहीं किया, फिर अचानक ही भगवान् कैसे याद आये ? ऐसा समझकर प्रसन्न हो जाओ कि मैं तो निहाल हो गया । मेरे को भगवान्‌ ने याद कर लिया । अब और काम पीछे करेंगे । अब तो भगवान्‌ में ही लग जाना है; क्योंकि भगवान् याद करते हैं,ऐसा मौका कहाँ पड़ा है ? ऐसे लग जाओ तो बहुत ज्यादा भक्ति है । जब अंगद रवाना हुए और उनको पहुँचाने हनुमान्‌ जी गये तो अंगद ने कहा‒‘बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि’ याद कराते रहना रामजी को । तात्पर्य जिस समय अचानक भगवान् याद आते हैं, उस समय को खूब मूल्यवान् समझकर तत्परता से लग जाओ । इस प्रकार छः बातें हो गयीं ।

“गुप्त अकाम निरन्तर, ध्यान-सहित सानन्द ।
आदर जुत जप से तुरत, पावत परमानन्द॥“
॥“