मंगलवार, 23 अगस्त 2022

** छोटे बच्चों का स्वरूप कैसा होता हैं **

             ** छोटे बच्चे स्वयं ईश्वर का एक प्रारूप होते हैं **



छोटे बच्चे स्वयं ईश्वर का एक प्रारूप होते हैं, उनके सामीप्य में रहने से ईश्वर का आशिर्वाद प्राप्त होता है।

बड़े बुजुर्गों की सेवा करने से उनका आशिर्वाद प्राप्त होता है, वह भी परमात्मा के आशीर्वाद की तरह मूल्यवान होता है।

अतः जब भी हमें समय मिले तो हमें अधिक से अधिक समय छोटे बच्चों तथा बुजुर्गों के साथ व्यतीत करना चाहिए ताकि अधिक से अधिक ईश्वर और बड़े बुजुर्गों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकें।

जीवन में ईश्वर और बड़े बुजुर्गों के आर्शीवाद से अधिक मूल्यवान और कुछ नहीं होता है।



                                                                                   Pandit Tarun Dubey
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शिव विवाह कैसे हुआ ?

 शिव विवाह 


       “ भोलेनाथ का अद्भुत श्रृंगार ”      


 लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।

होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥


जितने देवता थे सब अपने-अपने  विमान को सजाने लगे बारात चलना है एकदम चमाचम , और भोलेनाथ का कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है। शिव जी के गण भोलेनाथ की ओर देखकर कहते हैं धन्य हो भोलेनाथ दुनिया की पहली बारात है दूल्हा एकदम नंग धड़ंग खड़ा और बाराती सज रहे हैं भला ऐसे कोई सजता है। आप बड़े भोलेनाथ हो महाराज, अरे विवाह ही करना होता तो पहले कुछ तैयारी कर लेते है, घर बार है की विवाह ही करोगे ?

 भोलेनाथ ने कहा घर बार तो नहीं है। देवताओं ने कहा अच्छा घर बार भी नहीं है , फिकर भी नहीं है ? भोलेनाथ ने कहा जब घर बार ही नहीं है तो फिकर काहे की, फिकर तो तब हो जब घर बार हो, गणों ने कहा कोई बात नहीं सरकार हम सब आपका श्रृंगार करेंगे, हम लोग आपको सजाएंगे, आप बिल्कुल परेशान मत होइए। भोले बाबा और भोले बाबा के गणों का कैसा अलौकिक श्रृंगार है । 

स्वीकृति दे दी, भोलेनाथ ने कहा चलो तुम सभी श्रृंगार करो, गणों ने कहा महाराज दूल्हे को सजाया जाता है तो उसे स्वर्ण मुकुट  पहनाया जाता है, तो आपके लिए भी स्वर्ण मुकुट की व्यवस्था करें। भोले बाबा ने कहा नहीं नहीं स्वर्ण मुकुट नहीं क्यों ? स्वर्ण मुकुट जिसके सिर पर होता है उसको अभिमान होता है और जिसके पास नहीं है उसे ईर्ष्या होती है। तो मैं ऐसा मुकुट नहीं पहनना चाहता की पहनने वाले को अभिमान हो और देखने वाले को ईर्ष्या हो, गणों ने कहा तो सरकार मुकुट की व्यवस्था कहां से होगी। भोले बाबा ने कहा इस जटा को ही मुकुट बना दो जटामुकुट, गणों ने भगवान के जटाओं को ही गोल गोल घुमा कर उसे ही मुकुट बना दिया, भोले बाबा ने कहा बस यह बढ़िया है। अब जिसको ईर्ष्या हो वह अपनी जटा बढ़ा ले, इसलिए हम तो जटा का ही मुकुट बनाएंगे।

 सर्प का मौर , विवाह का अर्थ होता है, संसार से अपना संबंध जोड़ना, भगवान शिव अपने सिर पर सर्प का मौर स्वीकार करते हैं मानो वे समाज को बताना चाहते हैं की देखो जब संसार से जुड़ो तो सदा सर्वदा इस बात का ध्यान रखो कि कॉल सिर पर बैठा हुआ है इस बात को सदा ध्यान रखो।


दो बातन को भूल मत जो चाहै कल्यान ।

नारायण एक मौत को दूजे श्री भगवान ।।


संसार से संबंध जोड़ने जा रहे हैं तो सदा इस बात का ध्यान रहे सदा सर्वदा कॉल हमारे सिर पर है। इसलिए भगवान का स्मरण बना रहना चाहिए। जटा का मुकुट है। 

भगवान का एक गण गया, चिता की भस्म ले आया, चिता की भस्म को भोले बाबा के पूरे शरीर में मालिश कर दिया, भगवान शिव को यह भस्म बड़ी प्रिय है। भोलेनाथ को चिता भस्म इतनी प्रिय क्यों है ? एक बार कुछ लोग मुर्दे को कंधा देकर जा रहे थे और सब कह रहे थे राम नाम सत्य है भोले बाबा ने सुन लिया, भोले बाबा ने कहा अरे वाह , यह तो अपने ही दल के मालूम पड़ते हैं, भैया ,अरे मेरा भी नारा है

       सत हरि भजन जगत हरि सपना।

और ये सब भी कह रहे हैं राम नाम सत्य है तो यह तो अपने ही दल के मालूम पड़ते हैं ।भोलेनाथ उन्हीं के संग में लग गए, अब जिन लोगों ने उस शव को कंधे पर रखा था श्मशान घाट पर ले कर गए और फिर जैसे ही मुर्दे को आग लगाई गई चिता जलने लगी वैसे ही जो लोग राम नाम सत्य कह रहे थे। वही लोग चाय की दुकान पर चाय पीने लगे। और आपस में कह रहे हैं, तुमको कैसे पता चला कि ये मर गया, एक ने कहा अरे मुझे अचानक सूचना मिली मैं अपनी दुकान बंद करके आया हूं इसके चक्कर में, एक ने कहा अरे रहने दे मेरे घर में पुताई का काम चल रहा था पुताई का काम आधे में छोड़कर पीछे-पीछे चला आया, एक ने कहा अरे तुम अपनी सुनावोगे अरे मेरी तो सरकारी नौकरी है आजकल वैसे भी अंगूठे का सिस्टम हो गया है तो मैं तो सरकारी नौकरी छोड़ कर आया हूं और हद तो तब हो गई जब एक ने कह दिया अगर मरना ही था तो संडे को नहीं मर सकता था ! 

भोले बाबा ये सारी बातों को सुन रहे थे अरे राम-राम जिसको मैं अपने दल का समझ रहा था वे तो दूसरे दल के मालूम पड़ रहे हैं जैसे ही चिता में आग लगाई, इनकी तो विचारधारा ही बदल गई। ये मेरे दल के नहीं हो सकते, किन्तु धन्य है ये शव जिसके कारण  राम नाम का प्रचार तो हुआ , यह धन्य है ।  भोले बाबा, दौड़े-दौड़े गए जो चिता जल रही थी उसकी राख को अपने शरीर में लपेट लिया और कहने लगे जीते जी भले ही राम नाम न ले सका, लेकिन मरने के बाद इसके वजह से कम से कम लोगों ने तो राम नाम का आश्रय लिया इसलिए धन्य है ये, इसके समान कौन हो सकता है ? तो भोले बाबा ने उस चिता भस्म को अपने शरीर में लपेट लिया।

    “चिताभस्मालेपो”      इसीलिए भगवान को चिता भस्म अति प्रिय लगती है । भोले बाबा चिता भस्म लगा करके तैयार हो रहे हैं। गणों ने कहा सरकार तैयार हो गए हो तो एकाद बढ़िया वाहन मंगाए वीआईपी कोई गाड़ी बुलाए दूल्हा सरकार उसमें बैठकर जाएंगे , भगवान ने कहा नहीं नहीं मैंने जीवन भर बैल की सवारी की और अगर आज विवाह के अवसर पर मैं बैल को त्याग दूंगा, तो क्या सोचेगा, वाह भोलेनाथ जीवन भर मेरी सवारी की और सौभाग्य का अवसर आया तो मुझे छोड़कर किसी और की सवारी कर ली। इसलिए मेरा तो सिद्धांत है जिसको मैंने जीवन भर अपने साथ रखा है सौभाग्य के अवसर पर भी मैं उसको साथ लेकर जाऊंगा। इसलिए भोलेबाबा बैल पर बैठे, अच्छा बैठ कैसे रहे हैं ? बैल के पूछ की ओर भोले बाबा का मुख है, उल्टे बैठ रहे हैं । क्यों ? क्योंकि इस विवाह में भोलेनाथ के इष्ट भगवान नारायण भी पधारे हुए हैं और अगर भोलेनाथ सीधे बैठते हैं तो भगवान की तरफ उनकी पीठ हो जाती, इसलिए भगवान शिव ने सोचा, मैं संसार की ओर पीठ भले ही दिखा लू, पर मैं अपने राम को पीठ नहीं दिखा सकता हूं। संसार की ओर भले ही मेरी पीठ हो जाए फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन राम जी की ओर मेरा मुख होना चाहिए ।


 भगवान की ओर अगर मुख होगा तो संसार की तरफ पीठ हो जाए तो भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । हम परमात्मा के  सन्मुख हो, भोलेबाबा बैल पर बैठे।


 बारात का प्रस्थान


 अब भगवान की सुंदर बारात चल रही है, आइए हम सब भी इस बारात में सम्मिलित हो।

                      देखिए ये जो भगवान का श्रृंगार है  ये हंसी मजाक के लिए नहीं है। जीवन का दर्शन इस श्रृंगार में भरा पड़ा  है, लेकिन दिखाई उन्हीं को पड़ता है जो देखना चाहते हैं तो भोले बाबा इस दिव्य श्रृंगार को लेकर चल रहे हैं। भगवान विष्णु आए, विष्णु भगवान ने भोलेनाथ को देखा तो कहने लगे अरे राम राम दूल्हा इतना सुंदर है और बाराती दूल्हे के अनुकूल नहीं है इसीलिए कहते हैं “विलग विलग होइ चलहु सब ।” इसलिए सब विलग विलग होकर चलो, अलग अलग होकर चलो 

 सही बात है भगवान शिव है परमार्थी और देवता है स्वार्थी। स्वार्थी अगर परमार्थी के संग चलेगे तो कहां शोभा बनेगी, महाराज परमार्थी के संग तो नवधा भक्ति चलेगी इसलिए भोलेनाथ ने कहा जाओ मेरे निज समाज को बुलाओ, श्रृंगी दौड़ा-दौड़ा गया किसी कुएं में झांक कर कहा, जितने भूत प्रेत है सब चलो भोले बाबा की बारात में जल्दी , और भूत प्रेत दौड़ पङते हैं और कहते हैं धन्य हो मेरे भोलेनाथ, संसारियो को पता चल जाए हम घर में हैं, तो बोतल में बंद करवा के जमीन में गढ़वा देते हैं। और धन्य है हमारे भोले बाबा का स्वभाव अपने बारात में हमको सम्मिलित कर रहे हैं। सारा समाज भोलेनाथ का एकत्रित हो गया और कैसा अद्भुत समाज है।


“ भोलेनाथ की अद्भुत बारात ”



        कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू ।

        बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू ॥

        बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना ।

          रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥


और नवी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके मुख नहीं है,कोई सृकाल के जैसा है, कुत्ते के जैसा है, सूअर के जैसा है वे नवी पंक्ति में चल रहे हैं जानते हैं यह नौ पंक्तियां कौन-कौन है यह साक्षात नवधा भक्ति ही नव पंक्तियों में विभक्त करके श्रद्धा और विश्वास के परिणय की साक्षी बनने के लिए जा रही हैं। नवधा भक्ति ही नव पंक्तियों में विभक्त है।

 “ कोउ मुख हीन” ये श्रवण भक्ति है। श्रवण के लिए कानों की आवश्यकता होती है मुख की। नहीं होती है। 

“ विपुल मुख काहू।” ये कीर्तन भक्ति है कीर्तन करने के लिए जितना मुख हो उतना ही आनंद आता है। हम लोग इतने लोग बैठे हैं कितना आनंद आता है। तो दूसरी पंक्ति मैं भोलेनाथ का जो समाज चल रहा है जिनके बहुत से मुख हैं ये कौन सी भक्ति है ? ये कीर्तन भक्ति है।

“ विनु पद कर ” तीसरी पंक्ति में वो चल रहे हैं, उनके हाथ पैर नहीं है।ये स्मरण भक्ति है । स्मरण करने के लिए हाँथ पैर की आवश्यकता थोड़ी पड़ती है।


चौथी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके “ बहु पद बाहु ” जिनके बहुत से हाथ पैर हैं ये “ पाद सेवन भक्ति” है भगवान के पाद सेवन करने के लिए जितना हाथ पैर हो उतना ही कम लगता है। लगता है ना की ठाकुर जी की सेवा करने के लिए और दस हाथ होते तो कितना आनंद आता।


“ विपुल नयन” किसी के बहुत से नेत्र हैं यह अर्चन भक्ति है भगवान का अर्चाविग्रह निहारने के लिए लगता है की हजार आंखें मिल जाए तो आनंद आ जाए।


“ कोऊ नयन विहीना।” यह वंदन भक्ति है जब हम भगवान को निहारते हैं तो आंखें खुलती हैं। लेकिन जब हम भगवान को प्रणाम करते हैं तो आंखें बंद हो जाती हैं। यह वंदन भक्ति के प्रतीक हैं।

”  रिष्ट पुष्ट ” जो बहुत मोटे ताजे हैं ये कौन सी भक्ति है ?

      

     श्रवणं किर्तनं विष्णो स्मरणं पाद सेवनम् ।

     अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्य आत्मनिवेदनं ।।


      यह दास्य भक्ति है सेवक जितना ही मोटा ताजा हो उतना ही सेवा करेगा।जब सेवक ही दो हड्डी का है तो भला सेवा क्या करेगा ?जो रिष्ट पुष्ट  हैं वो किसके प्रतीक हैं ? ये दास्य भक्ति के प्रतीक हैं।


और अंत में नवी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके मुख नहीं है,कोई सृकाल के जैसा है, कुत्ते के जैसा है,कोई सूअर के जैसा है ये आत्मनिवेदन भक्ति है । “जब अपने आप को ही प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया तो क्या फर्क पड़ता है कि हमारा मुख कैसा है ? तो ये नवधा भक्ति ही पार्वती माता के विवाह में सम्मिलित होने जा रही है। इसलिए नारायण भगवान कहते हैं अलग अलग होकर चलो, शिवजी परमार्थी अब शिवजी का समाज है वो चल रहा है। आइए हम भी बड़े प्रेम के साथ भगवान के बारात में सम्मिलित हो। बोलो भक्त वत्सल भगवान की जय।।

  भोले बाबा अपने विचित्र बारातियों को संग में लेकर के हिमाचल नगर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं ।

            इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना ।  

 हिमांचल महाराज ने बहुत सुंदर व्यवस्था करी।

          अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥ 

देवता सब अपना - अपना समाज ले करके आ रहे हैं सबसे पहले आज इंद्र अपने समाज को लेकर पहुंच गए हैं अब इधर आगवानी करने के लिए बालक, वृद्ध बारात को देखने के लिए खड़े हैं, बालक दौड़ पड़े, बालकों ने जब इंद्र की शोभा को देखा। बालक सब कहने लगे भैया हो न हो  दूल्हा सरकार यही लगते हैं, देखो तो कितने सुंदर लग रहे हैं, एक ने कहा चलकर पूछो तो सही ऐसे ही मन में थोड़ी ना निर्णय करना चाहिए। अच्छा ठीक है बच्चे सब दौड़ते - दौड़ते  देवराज इंद्र के पास आए और पूछने लगे महाराज कृपा करके बताना दूल्हा सरकार आप ही हैं क्या ? देवराज इंद्र ने कान में हाथ रख लिया और कहा अरे बच्चों ये क्या कह रहे हो? मैं दूल्हा सरकार नहीं हूँ । तो आप कौन हैं?  देवराज इंद्र ने कहा मैं दूल्हा सरकार का  दासानुदास हूँ । बच्चे कहते हैं वाह जब दूल्हे का सेवक इतना सुंदर है तो दूल्हा सरकार कितने सुंदर होंगे? देवराज ने कहा वो कितने सुंदर हैं वो आएंगे देख लेना कितने सुंदर हैं ? भगवान जाने उनके आने के बाद  पानी भी मिले या न मिले ? देवता सब जनवासे  की ओर गये और इतने में बालकों ने देखा सर्वांग सुंदर भगवान नारायण का सुंदर समाज चला आ रहा है।

         

              हियँ हरषे सुर सेन निहारी । 

              हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥


जब भगवान लक्ष्मीपति नारायण का दर्शन किया,तो बच्चे बोल पड़े इनसे सुंदर संसार में कोई हो नहीं सकता, हो ना हो दूल्हा सरकार यही हैं, 

 तो जो सयाने थे उन्होंने कहा अरे मन से मत बोलो, जरा जाकर पूछो तो सही, तो बच्चे दौड़े दौड़े आते हैं सरकार बुरा मत मानना एक बात बताओ, दूल्हा सरकार आप ही हो क्या ? भगवान नारायण ने कहा अरे बच्चों क्या बात करते हो, मैं दूल्हा सरकार नहीं हूँ तो आप कौन हो महाराज ? भगवान बोले मैं तो दूल्हा सरकार का मित्र हूँ,  बच्चे कहते हैं वाह जब मित्र इतने सुंदर हैं तो हमारे सरकार कितने सुंदर होंगे ? भगवान ने कहा वो पीछे खड़े हैं, उनसे बच जाना, तब मेरे पास आना, नारायण तो चले गए जनवासे की ओर। इतने में भगवान शिव का वो विकराल समाज भूत, प्रेत, डाकिनी, पिशाचिनी विचित्र बोल बोल रहे हैं। अब भूत हैं तो भूतइ के भाषा में तो बोलेंगे।


    नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।

देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥


सब नाच रहे हैं, गा रहे हैं, सब विचित्र भाषा में बोल रहे हैं, और भोलेनाथ के गुणों का गान कर रहे हैं, क्या बोल रहे हैं ?

     

       बम्बम बम्बम बोलों जय शिव,जय शिव .......


 भूत प्रेत सब जयकारा लगा रहे हैं अब आगवानी  करने वालों ने जैसे ही भगवान का वह विकराल रूप देखा, भाग चले सब के सब, जितने हाथी, घोड़ा थे वह तो ऐसे भागे महाराज की दूर-दूर तक नजर ही नहीं आयें, विचित्र वह समाज ,और हद तो तब हो गई देखो  भगवान के समाज में देश से भी भूत आए हैं और विदेश से भी आए हैं। ऐसे थोड़ी ना है कि भारत से ही आए हैं भूत सारे विश्व से आए थे, अंतर इतना ही था जो भारत से आए थे वह तो हर हर हर कह रहे थे और जो विदेश से आए थे वह हाय हाय कर रहे थे अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता का असर भूत - प्रेतो पर भी था।

  आगवानी करने वाले बोले हे भगवान, ये कैसी बारात है ? और हद तो तब हो गई जब एक बाराती आगवानी करने वाले के पास आकर कहता है। हमारे ठहरने की व्यवस्था कहां है ? और जब उसने विचित्र भाषा में बोला तो वह थर-थर कांपने लगा और बोला महाराज आप जहां ठहर जाओ वही व्यवस्था है। तुम्हें कौन ठहरा सकता है ? महाराज हमारे पास इतनी व्यवस्था नहीं है कि हम तुम्हें ठहरा पाएं, तुम जहां ठहर जाओ वही तुम्हारी व्यवस्था है, जो करो वही इंतजाम, सारे भूत-प्रेत आनंद कर रहे हैं और सब बच्चे घर चले आए।

               माताओं के पास आए तो माताओं ने बच्चों से पूछा कि बेटा बारात कैसी है, बच्चों ने कहा माँ वह बारात नहीं है, साक्षात यमराज की सेना है, अच्छा तो दूल्हा कैसा है बच्चे कहते हैं, वह साक्षात यमराज है हमारा परम सौभाग्य है हम जीवित बच गए । तुम तो बारात देखने जाना नहीं अगर उस बारात का दर्शन किया तो जीवित नहीं बचोगी तो माताएं बच्चों को समझाती हैं देखो घबराने की जरूरत नहीं है । यह साक्षात भोलेनाथ का विवाह है और भोलेनाथ के विवाह में तो यह सब होता ही रहता है । बच्चों ने कहा खूब दे दो उपदेश, जब पङोगी सामने तब पता चलेगा, अभी खूब उपदेश करो। 

यही माताएं मैना जी के पास गई और मैना जी ने सुंदर आरती की थाल सजायी और भगवान भोलेनाथ के सामने मैना जी सुंदर आरती  की थाल लेकर पहुंच गई और सखियां सुंदर-सुंदर गीत गा रही है। मैना जी आरती उतारे तो कैसे ? भोले बाबा उल्टे बैठे हैं अब भोलेनाथ की पीठ मैना जी को दिखाई पड़ रही है, तो आरती उतारे तो कैसे उतारे ? भगवान शिव का एक गण था, उसने कहा देखो भगवान की आरती उतारनी तो एक काम करो, बैल को उल्टा करो भोलेनाथ अपने आप सीधे हो जाएंगे । अब बैल को उल्टा करने से पहले बैल की पूजा की गई अक्षत, हल्दी लगाया गया, भोलेनाथ प्रसन्न हो गए की मेरी पूजा हो ना हो मेरे नंदी की तो पूजा हो गई यही पर्याप्त है। जैसे बैल को उल्टा घुमाया तो भोलेनाथ सीधे हो गए, मैना जी ने आरती थाल ऊपर उठाई भगवान के सिर पर मणिधर सर्प है। सर्प को आग से बड़ा भय लगता है लेकिन भगवान का स्वभाव पा गया है। सर्प पीछे हो गया, सर्प ने सोचा एक बार  क्षमा कर देते हैं और जब दोबारा मैना जी ने आरती की थाल उठाई, सर्प को ऐसा क्रोध आया जो फुस्सकार  लगाई और मैंना जी हड़बड़ा कर भोलेनाथ को देखा, ऐसा विकराल रूप, थाली ही भगवान के ऊपर पटक दिया और दैया - मैया करती हुई भागी।

                      हे भगवान ऐसा विकराल दूल्हा, जितनी माताएं थी, सब अपने-अपने घर के दरवाजा बंद कर लिये हैं । इससे बड़ा क्या, दूल्हे का आपमान हो सकता है। लेकिन धन्य है भगवान भोलेनाथ,जो अभी भी उसी आनंद में है । देवता भोलेनाथ के पास आए और बोले महाराज आप का ऐसा अपमान हमसे देखा नहीं गया, भोले बाबा ने कहा अच्छा मेरा अपमान भी हो गया क्या, अरे धन्य है भोलेनाथ इतना बड़ा अपमान हो गया, आपको दिखाई नहीं पड़ा क्या,  , देवताओं ने कहा सरकार आपको देखकर माताओं ने अपने-अपने घर के किवाड़ बंद कर लिये , क्या ये अपमान नहीं है ?

 भोले बाबा ने कहा अरे राम-राम मुझे लगा, इस देश की परंपरा है की दूल्हे को देखकर जितनी माताएं हैं अपने अपने घर के दरवाजे बंद कर लेती हैं। मुझे क्या पता ? देवताओं ने कहा धन्य हैं महाराज अरे आपको देखकर दीपक बुझ गया ये आपका अपमान नहीं है ?

 भगवान शिव ने कहा देवताओं जिसके सिर पर द्वितीया के चंद्रमा विद्यमान हो, उसे देखकर दीपक बुझे नहीं तो क्या होगा, मुझे दीपक दिखा रही हैं मेरे सिर पर ही द्वितीया का चंद्रमा विधमान है दीपक को बुझना ही पड़ेगा।

 अरे महाराज आप को देख कर पानी का पात्र गिर गया, जल से भरा पात्र गिर गया आपका अपमान नहीं हुआ ?

 भोले बाबा ने कहा देवताओं जिसके सिर से गंगा रुपी राम भक्ति की धारा प्रगट हो रही हो तो उसे कोई लोटे से जल देगा, तो क्या होगा।

 देवताओं ने कहा धन्य हो महाराज आपको देखकर आप की सासु मां डर गई, भोले बाबा ने कहा यही तो बात है,  मेरी सासु मां मुझे देखकर नहीं डरी, इस सर्प को देखकर डरी, जीव जब काल की ओर देखता है तो भयभीत हो जाता है और जब महाकाल की ओर देखता है तो निर्भय हो जाता है।

               मेरी सासु मां ने अगर मुझे देखा होता तो निर्भय हो जाती वह तो भयभीत इसलिए हुई की मुझे ना देख कर इस सर्प की ओर देखा। धन्य है सरकार आपको मान - अपमान से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। 


इधर मैना जी को शोक हुआ, नारद जी महाराज आए, नारद जी ने छण भर में भय समाप्त किया और मैना जी  से कहा,  मैना जी, जिसको आप अपनी बिटिया समझ रही हैं असल में वो आपकी बिटिया नहीं है। वो सारे जगत की मां है।


“ भोलेनाथ का विवाह ”



            मयना सत्य सुनहु मम बानी । 

            जगदंबा तव सुता भवानी ॥



जिसको आप अपनी बिटिया समझ रही हो न ये सारे जगत की मां है इसलिए उसका भार अपने ऊपर लेने की आवश्यकता नहीं है,अपना भी भार उन्हीं के चरणों में समर्पित कर दो कल्याण जाएगा।

           सारा विषाद समाप्त हुआ। भूत प्रेतों ने कहा महाराज हम तो अब पहले भोजन करेंगे, विवाह होवे या ना होवे बात की बात है। दूल्हे को देखकर सासु मां मूर्छित हो गई, कहीं फेरे के समय माता जी मूर्छित हो गई तो हम बिना भोजन के ही रह जाएंगे इसलिए पहले शिव जी के गणों ने भोजन किया, जेवनार हुआ और शिव जी के गणों को बहुत सुंदर भोजन कराया जा रहा है, बड़ा आनंद रहा है। अब देखिए, “ कोऊ मुखहीन विपुल मुख काहू ” बिना मुख वाले व्यक्ति के सामने, पत्तल परोसने वाले ने सोचा कि इसको पत्तल क्या परोसे ? यह सोच कर आगे चला गया और जब आगे चला गया तो पीछे से आवाज आती है हम यहां हैं अब वह घूम- घूम के देखें, यह बोल कौन रहा है ? उसके बगल में एक बहुत मुख वाला बैठा था उसने कहा अरे भैया तुम मेरे बगल वाले को पत्तल नहीं परसे वह तुम्हें बुला रहा है। परोसने वाले ने सोचा यह खाएगा कैसे इसके मुख ही नहीं है। बहुमुखी वाला बोला देखो यह उसकी समस्या है तुम्हारी नहीं तुम तो पत्तल परोसो उसके सामने। तो पत्तल परोस दिया ।

 दूसरे के पास गया ,उसके बहुत से मुख थे, बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो एक बार गलती कर दे तो दुबारा न करें। तो उसने  जितने मुख थे उतने ही पत्तल परोस दिये, परिक्रमा लगाकर के लो महाराज खाओ ।

एक व्यक्ति खीर लेके आया वह इतना डरा हुआ था की उसने दूर से बांस में करछुल बांधकर दूर से ही खीर परोसने लगा लो खाओ ।

उसने सोचा अगर झपटे तो केवल डंडा ही जाएगा हाथ तो सलामत रहेगा, क्या आनंद हो रहा है बहुत आनंद हो रहा है बड़ी प्रेम से भोलेनाथ का विवाह संपन्न हो रहा है माताएं गा रही है ।

             सुंदर जेवनार हुआ फिर भोलेनाथ का सुंदर विवाह 


 भोलेनाथ ब्राह्मणों को प्रणाम करके सुंदर आसन पर बैठे हैं। साक्षात वेद ही ब्राह्मण के रूप में बैठे हैं। शिव पार्वती का विवाह संपन्न कर रहे हैं। बड़े प्रेम से माता पार्वती और भोलेनाथ का विवाह संपन्न हुआ। देवताओं ने जय जयकार किया।


         हर गिरिजा कर भयउ बिबाहु । 

         सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥


भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह बड़े प्रेम से संपन्न हुआ। बोलिए शंकर भगवान की जय, पार्वती मैया की जय

      बड़े प्रेम के साथ माता पार्वती और शिव का विवाह संपन्न हुआ। विदाई का अवसर सजल नेत्रों से मैंना जी ने पार्वती मैया को विदा किया और पार्वती मैया से कहा बेटी सदा सर्वदा शंकर जी के चरणों की सेवा करना।


          करेहु सदा संकर पद पूजा । 

          नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥


बहुत सुंदर शिक्षा दी, मां पार्वती विदा होकर कैलाश पर्वत पर आई। कैलाश पर्वत पर माता पार्वती और भगवान शिव की अलौकिक सोभा है। बहुत दिनों तक भोलेनाथ ने -


          करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा । 

          गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥


कालांतर में स्वामी कार्तिकेय जी का जन्म हुआ जिन्होंने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया गोस्वामी जी कहते हैं।


शिव विवाह प्रसंग की फलश्रुति -


यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।

कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं ॥


जो भी लोग भगवान शिव और माता पार्वती के पावन परिणय को सुनते हैं उनके घर पर सदा उत्साह ही उत्साह बना रहता है । ऐसे भगवान की कृपा से हम लोगों ने बड़े प्रेम से भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की चर्चा को श्रवण किया।



                                                                                  Pandit Tarun Dubey

सोमवार, 22 अगस्त 2022

🌸 अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे करें ,पाप से मुक्ति के उपाय🌸

🌸 अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है...? 🌸💐👏🏻


बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।




श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ने ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए ।

बोले भगवन - आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते
हैं।
प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने
चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप
पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन्- भोजन बनाकर अग्नि भोजन, रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी
मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ।

राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है। हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि
गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या।
तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं
राजन्

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।


नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई व्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई व्यक्ति यम, नियम, आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव
परायणः ।


राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !----- सुनिए

स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
न जाने या स्वास की आवन होय न होय। ।


राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।
इस लिए सदैव हरी का जपते रहो ।

मैं तो जी माहराज आप सबसे यह निवेदन करना चाहूँगा की, भगवान राम और कृष्ण के नाम को जपने
के लिए कोई भी नियम की जरूरत नही होती है कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते, उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

                                           🌹🌿🌹 श्री राधे कृष्णा 🌹🌿🌹




                                                                     Pandit Tarun Dubey

गजकेसरी योग का किस राशि को क्या फल देगा ?


         गजकेसरी योग का किस राशि को क्या फल मिलेगा?

 ज्योतिष में हजारों प्रकार के योगों का उल्लेख मिलता है। उसी में से एक योग है गजकेसरी योग। यह योग मूलतः बृहस्पति और चन्द्रमा के संयोग से बनता है। गज का अर्थ है हाथी और केसरी मतलब सिंह। जिस प्रकार से गज और सिंह में अपार साहस, शक्ति होती है उसी प्रकार से जन्मकुण्डली में गजकेसरी योग होने से व्यक्ति साहस व सूझबूझ के दम पर, उच्च पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सामाज में सम्मानीय होता है। आज हम आपको कुण्डली की लग्न के अनुसार बनने वाले गजकेसरी योग के फल के बारें में बता रहें है।

 

मेष
मेष  लग्न का स्वामी मंगल होता है। मंगल का गुरू व चन्द्रमा दोनों से सम्बन्ध अच्छा रहता है। इस राशि में गजकेसरी योग बनने से जातक साहसी व तर्कशील होता है। शत्रुओं पर विजय पाता है एंव वाद-विवाद में उसे महारथ हासिल होती है। गुरू महत्वाकांक्षा और राजनीति से जुड़ा ग्रह है, इसलिए मेष राशि वालों को गजकेसरी योग राजनीति में भी सफलता दिलाता है। आप कठोर निर्णय लेने में हिचकेंगे नहीं। धन की पर्याप्त मात्रा रहती है।
 

वृष
इस लग्न का स्वामी शुक्र होता है एंव चन्द्रमा तृतीयेश व गुरू अष्टमेश तथा लाभेश होता है। इस लग्न में गजकेसरी योग बनने पर व्यक्ति को धार्मिक कार्याे में रूचि, स्वभाव में सह्रदयता, परोपकार की भावना मन में विद्यमान रहती है। गुरू अगर अच्छी स्थिति में अचानक धन का लाभ एंव भूमि आदि मिल सकती है। चन्द्रमा पराक्रमेश होने के कारण आप-अपने बलबूते पर सफलता प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन
इस लग्न में चन्दमा द्वितीयेश है और गुरू सप्तमेश व दशमेश है। गुरू व चन्द्र की युति से बनने वाला गजकेसरी योग काफी लाभकारक सिद्ध होगा। ऐसे व्यक्ति दूसरों का हित करने वाले प्रतिभाशाली होते है। गुरू दशमेश होकर अगर अच्छी पोजीशन में बैठा है तो मिथुन लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है।
 

कर्क
जब कर्क लग्न की कुण्डली में गजकेसरी योग का निर्माण होता है तो जातक विद्वान होता है। ऐसा व्यक्ति जिस क्षेत्र में जाता है, वहॉ लोकप्रिय हो जाता है। संस्कारों से जुड़े ऐसे जातक अपनों को साथ लेकर चलने में विश्वास करते है। ये लोग सत्य का साथ देने में विश्वास करते है। इनकी लगभग हर मनोकामनायें पूर्ण होती है।

सिंह
सिंह लग्न की कुण्डली में बनने वाला गजकेसरी योग बहुत ही फलदायक होता है। यह योग सिंह के समान शक्ति देने वाला होता है। शत्रुओं का नाश करता है, राज सुख दिलाता है, जीवन के प्रति आशावाना बनाता है, घूमने-फिरने का शौकीन बनाता है, प्रकृति के प्रति लगाव बढ़ाता है। इस लग्न में जन्में व्यक्तियों को संसार की आसुरी शक्तियों से लड़ने का जज्बा मिलता है।

कन्या
इस लग्न में जन्में जातकों के लिए भी गजकेसरी योग लाभकारी सिद्ध होता है। जिनकी कुण्डलियों में गजकेसरी होता है, उनमें निर्भीकता, बौद्धिकता, साहस, धार्मिकता, सामाजिकता व न्यायप्रियता आदि होती है। गुरू चतुर्थेश व सप्तमेश होता है और चन्द्रमा लाभ भाव का मालिक होता है। जिस कारण कन्या लग्न में बनने वाले गजकेसरी योग का युवा अवस्था में फल मिलने की सम्भावना रहती है।
 

तुला
तुला लग्न की कुण्डली में गुरू तृतीयेश व षष्ठेश होता है एंव चन्द्रमा दशम भाव का मालिक होता है। इसलिए इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग मिला-जुला फल देने वाला होता है। यह व्यक्ति अपने जन्म निवास दूर-दराज प्रदेश या विदेश में जाकर धन कमाता है। जातक स्वभाव से जिद्दी व तानाशाही प्रकृति का होता है।
 

वृश्चिक
इस लग्न में गजकेसरी योग बनने से व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में कुशल होता है एवं अपनी जुबान का पक्का होता है। साहसी कार्यो में विजय हासिल करता है। ऐसे जातक पुलिस, मेडिकल, आर्मी, वायुसेना आदि क्षेत्रों में उॅचा मुकाम हासिल करता है। ये लोग अपनी सूझबूझ के कारण काफी चर्चित रहते है।
 

धनु
धनु राशि का स्वामी गुरू ग्रह होता है। गजकेसरी योग में गुरू की अहम भूमिका होती है। अतः इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध होता है, लेकिन यदि गुरू बलवान अवसथा में हो तभी पूर्ण फल मिल पायेगा। ऐसा व्यक्ति धार्मिक कार्यो में लिप्त रहने वाला होता है। शिक्षा के क्षेत्र में ये लोग अच्छी प्रगति करते है।
 

मकर
मकर लग्न का स्वामी शनि ग्रह है। शनि और गुरू की आपस में अच्छी मित्रता है। जिस कारण इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग काफी फलदायक माना जाता है। शनि एक नाकारात्मक ग्रह है जिसका अधिक असर इस लग्न में रहता है। यदि इस लग्न की कुण्डली में शनि और गुरू दोनों बलवान है तो इस योग बेहतर फल मिलेगा अन्यथा सामान्य फल मिलेगा।

 

कुम्भ
इस लग्न की कुण्डली में बनने वाले गजकेसरी योग का भी अच्छा फल मिलता है। यह भी शनि की राशि है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया वाली स्थिति बनी रहती है। मित्रों के सहयोग से बड़े कामों में सफलता मिलती है। सोंचे हुये कार्य पूर्ण होते है किन्तु समय लगता है।
 

मीन
मीन राशि बृहस्पति की राशि है। इसलिए इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग सफलता दिलाने में पूरा सहयोग करता है। ऐसा व्यक्ति धर्म का जानकार होता है, शिक्षा देने वाला गुरू व सामाज की सेवा व एक सही मार्ग दिखाने वाला समाज सुधारक होता है। इस योग वाले व्यक्ति सम्मान व प्रतिष्ठा के भूखे रहते है। समाज की इनकी हर बात को काफी तवज्जो देता है।  




                                                                        Pandit Tarun Dubey

मनुष्य जो कर्म करता है उसका साक्षी कौन है ?

                                                ॐ

                मनुष्य जो कर्म करता है उस का साक्षी कौन है ?

* दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥

भावार्थ:-धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँ तक व्यवहार हैं, जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं॥


मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है।

‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’

पाप और पुण्य

वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो।

मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी

सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं।

सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी हरसमय नहीं रहती; किन्तु रात-दिन और संध्या में से कोई एक तो हर समय रहता ही है। दिशाएं, आकाश, वायु, पृथ्वी, जल सदैव रहते हैं, मनुष्य इन्हें छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता, इनसे छुप नहीं सकता। मनुष्य की इन्द्रियां, काल और धर्म भी सदैव उसके साथ रहते हैं। कोई भी कर्म किसी-न किसी इन्द्रिय द्वारा किसी-न-किसी समय (काल) होगा ही। उस कर्म का प्रभाव मनुष्य के ग्रह-नक्षत्रों व पंचमहाभूतों पर पड़ता है। जब मनुष्य कोई गलत कार्य करता है तो धर्मदेव उस गलत कर्म की सूचना देते हैं और उसका दण्ड मनुष्य को अवश्य मिलता है।

कर्म से ही देह मिलता है

पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है।

कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म (झाड़ी), लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है। यदि जीव कीटयोनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है।

विभिन्न पापयोनियां

इस संसार-चक्र में मनुष्य घड़ी के पेण्डुलम की भांति विभिन्न पापयोनियों में जन्म लेता और मरता है–

–माता-पिता को कष्ट पहुंचाने वाले को कछुवे की योनि में जाना पड़ता है।

–मित्र का अपमान करने वाला गधे की योनि में जन्म लेता है।

–छल-कपट कर जीवनयापन करने वाला बंदर की योनि में जाता है।

–अपने पास रखी किसी की धरोहर को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है।

–विश्वासघात करने से मनुष्य को मछली की योनि मिलती है।

–विवाह, यज्ञ आदि शुभ कार्यों में विघ्न डालने वाले को कृमियोनि मिलती है।

–देवता, पितर व ब्राह्मणों को भोजन न कराकर स्वयं खा लेता है वह काकयोनि (कौए) में जाता है।

दुर्लभ है मनुष्ययोनि

इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्ययोनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है।

इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को भगवान विष्णु की सेवा-आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। भगवान विष्णु के जो-जो स्वरूप हैं, उनकी भक्ति करने से मनुष्य संसार-सागर आसानी से पार कर परमधाम को प्राप्त करता है।

भगवान विष्णु ने बताया संसार-सागर से पार होने का उपाय

भगवान विष्णु ने संसार-सागर से पार होने का उपाय भगवान रुद्र को बताते हुए कहा कि ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ स्तोत्र से मेरी नित्य स्तुति करने से मनुष्य भवसागर को सहज ही पार कर लेता है।

‘जिनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियों के लिए भी दुर्लभ मुक्ति उन भक्तों के हाथ में ही रहती है।’ (नारदपुराण)

भक्तों की गति

भक्त अपने आराध्य के लोक में जाते हैं। भगवान के लोक में कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के समान रूप पाकर वहां रहना सारुप्य-मुक्ति है। भगवान के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। भगवान के श्रीविग्रह में मिल जाना सायुज्य-मुक्ति है।

जिस जीव को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह भगवान की इच्छा से उनके साथ या अलग से संसार में दिव्य जन्म ले सकता है। वह कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। संसार में भगवत्कार्य समाप्त करके वह पुन: भगवद्धाम चला जाता है।

मुक्त पुरुष

मनुष्य बिना कर्म किए रह नहीं सकता। कर्म करेगा तो पाप-पुण्य दोनों होंगे। लेकिन जो मनुष्य सबमें भगवत्दृष्टि रखकर भगवान की सेवा के लिए, उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए और भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है तो उसके कर्म भी अकर्म बन जाते हैं और कर्म-बंधन में नहीं बांधते हैं। वह संसार में रहते हुए भी नित्यमुक्त है।

तत्त्वज्ञानी पुरुष संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। उनके प्राण निकलकर कहीं जाते नहीं बल्कि परमात्मा में लीन हो जाते हैं। सती स्त्रियां, युद्ध में मारे गए वीर और उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं।

गीता में शुक्ल तथा कृष्ण मार्ग कहकर दो गतियों का वर्णन है–

जिनमें वासना शेष है, वे धुएं, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाए जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
जिनमें कोई वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर नहीं लौटते हैं।
पितृलोक

यह एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। एक जीव को पृथ्वी पर जिस माता-पिता से जन्म लेना है, जिस भाई-बहिन व पत्नी को पाना है, जिन लोगों के द्वारा उसे सुख-दु:ख मिलना है; वे सब लोग अलग-अलग कर्म करके स्वर्ग या नरक में हैं। जब तक वे सब भी इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थिति में न आ जाएं, इस जीव को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृलोक इसलिए एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है।

प्रेतलोक

यह नियम है कि मनुष्य की अंतिम इच्छा या भावना के अनुसार ही उसे गति प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी प्रबल राग-द्वेष, लोभ या मोह के आकर्षण में फंसकर देह त्यागता है तो वह उस राग-द्वेष के बंधन में बंधा आस-पास ही भटकता रहता है। वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर बड़ी यातना भरी योनि प्राप्त करता है। इसीलिए कहा जाता है–‘अंत मति सो गति।’  




                                                                    Pandit Tarun Dubey