संतों ने भगवान से भक्ति क्यों मांगी
सन्तोंने भगवान्से
भक्ति माँगी है । अच्छे-अच्छे महात्मा पुरुषोंने भगवान्के चरणोंका प्रेम माँगा है‒
“जाहि न चाहिअ
कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।
बसहु निरंतर तासु
मन सो राउर निज गेहु ॥“
भगवान् शंकर
माँगते हैं‒
“बार बार बर मागउँ
हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी
भगति सदा सतसंग ॥“
तो उनके कौन-सी
कमी रह गयी ? पर यह माँगना
सकाम नहीं है । तीर्थ, दान आदि के जितने
पुण्य हैं, उन सब का एक फल माँगे कि
भगवान् के चरणों में प्रीति हो जाय । हे नाथ ! आपके चरणों में प्रेम हो जाय,
आकर्षण हो जाय । भगवान् हमें प्यारे लगें,
मीठे लगें । यह कामना करो । यह कामना सांसारिक
नहीं है ।
भगवान् का नाम
लेते हुए आनन्द मनाओ, प्रसन्न हो जाओ
कि मुख में भगवान् का नाम आ गया, हम तो निहाल हो
गये ! आज तो भगवान् ने विशेष कृपा कर दी, जो नाम मुख में आ गया । नहीं तो मेरे-जैसे के लिये भगवान् का नाम कहाँ ?
जिनके याद करने मात्र से मंगल हो जाय ऐसे जिस
नाम को भगवान् शंकर जपते हैं‒
तुम्ह पुनि राम
राम दिन राती ।
सादर जपहु अनंग
आराती ॥
वह नाम मिल जाय
हमारे को । कलियुगी तो हम जीव और राम-नाम मिल जाय तो बस मौज हो गयी, भगवान् ने विशेष ही कृपा कर दी । ऐसी सम्मति
मिल गयी, हमारे को भगवान् की याद
आ गयी । भगवान् की बात सुनने को मिली है; भगवान्की चर्चा मिली है, भगवान् का नाम
मिला है,भगवान् की तरफ वृत्ति हो
गयी है‒ऐसे समझकर खूब आनन्द
मनावें, खूब खुशी मनावें, प्रसन्नता मनावें ।
एक बात और
विलक्षण है ! उस पर आप ध्यान दें । बहुत ही लाभकी बात है, (६) जब कभी भगवान् अचानक याद आ जाये भगवान् का नाम अचानक
याद आ जाय,भगवान् की लीला अचानक
याद आ जाय, उस समय यह समझे कि भगवान्
मेरे को याद करते हैं । भगवान् ने अभी मेरे को याद किया है । नहीं तो मैंने
उद्योग ही नहीं किया, फिर अचानक ही
भगवान् कैसे याद आये ? ऐसा समझकर
प्रसन्न हो जाओ कि मैं तो निहाल हो गया । मेरे को भगवान् ने याद कर लिया । अब और
काम पीछे करेंगे । अब तो भगवान् में ही लग जाना है; क्योंकि भगवान् याद करते हैं,ऐसा मौका कहाँ पड़ा है ? ऐसे लग जाओ तो बहुत ज्यादा भक्ति है । जब अंगद रवाना हुए और
उनको पहुँचाने हनुमान् जी गये तो अंगद ने कहा‒‘बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि’ याद कराते रहना रामजी को । तात्पर्य जिस समय
अचानक भगवान् याद आते हैं, उस समय को खूब
मूल्यवान् समझकर तत्परता से लग जाओ । इस प्रकार छः बातें हो गयीं ।
“गुप्त अकाम
निरन्तर, ध्यान-सहित सानन्द ।
आदर जुत जप से तुरत, पावत परमानन्द॥“
॥“
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