मंगलवार, 23 अगस्त 2022

** छोटे बच्चों का स्वरूप कैसा होता हैं **

             ** छोटे बच्चे स्वयं ईश्वर का एक प्रारूप होते हैं **



छोटे बच्चे स्वयं ईश्वर का एक प्रारूप होते हैं, उनके सामीप्य में रहने से ईश्वर का आशिर्वाद प्राप्त होता है।

बड़े बुजुर्गों की सेवा करने से उनका आशिर्वाद प्राप्त होता है, वह भी परमात्मा के आशीर्वाद की तरह मूल्यवान होता है।

अतः जब भी हमें समय मिले तो हमें अधिक से अधिक समय छोटे बच्चों तथा बुजुर्गों के साथ व्यतीत करना चाहिए ताकि अधिक से अधिक ईश्वर और बड़े बुजुर्गों का आशिर्वाद प्राप्त कर सकें।

जीवन में ईश्वर और बड़े बुजुर्गों के आर्शीवाद से अधिक मूल्यवान और कुछ नहीं होता है।



                                                                                   Pandit Tarun Dubey
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शिव विवाह कैसे हुआ ?

 शिव विवाह 


       “ भोलेनाथ का अद्भुत श्रृंगार ”      


 लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।

होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥


जितने देवता थे सब अपने-अपने  विमान को सजाने लगे बारात चलना है एकदम चमाचम , और भोलेनाथ का कोई ध्यान ही नहीं दे रहा है। शिव जी के गण भोलेनाथ की ओर देखकर कहते हैं धन्य हो भोलेनाथ दुनिया की पहली बारात है दूल्हा एकदम नंग धड़ंग खड़ा और बाराती सज रहे हैं भला ऐसे कोई सजता है। आप बड़े भोलेनाथ हो महाराज, अरे विवाह ही करना होता तो पहले कुछ तैयारी कर लेते है, घर बार है की विवाह ही करोगे ?

 भोलेनाथ ने कहा घर बार तो नहीं है। देवताओं ने कहा अच्छा घर बार भी नहीं है , फिकर भी नहीं है ? भोलेनाथ ने कहा जब घर बार ही नहीं है तो फिकर काहे की, फिकर तो तब हो जब घर बार हो, गणों ने कहा कोई बात नहीं सरकार हम सब आपका श्रृंगार करेंगे, हम लोग आपको सजाएंगे, आप बिल्कुल परेशान मत होइए। भोले बाबा और भोले बाबा के गणों का कैसा अलौकिक श्रृंगार है । 

स्वीकृति दे दी, भोलेनाथ ने कहा चलो तुम सभी श्रृंगार करो, गणों ने कहा महाराज दूल्हे को सजाया जाता है तो उसे स्वर्ण मुकुट  पहनाया जाता है, तो आपके लिए भी स्वर्ण मुकुट की व्यवस्था करें। भोले बाबा ने कहा नहीं नहीं स्वर्ण मुकुट नहीं क्यों ? स्वर्ण मुकुट जिसके सिर पर होता है उसको अभिमान होता है और जिसके पास नहीं है उसे ईर्ष्या होती है। तो मैं ऐसा मुकुट नहीं पहनना चाहता की पहनने वाले को अभिमान हो और देखने वाले को ईर्ष्या हो, गणों ने कहा तो सरकार मुकुट की व्यवस्था कहां से होगी। भोले बाबा ने कहा इस जटा को ही मुकुट बना दो जटामुकुट, गणों ने भगवान के जटाओं को ही गोल गोल घुमा कर उसे ही मुकुट बना दिया, भोले बाबा ने कहा बस यह बढ़िया है। अब जिसको ईर्ष्या हो वह अपनी जटा बढ़ा ले, इसलिए हम तो जटा का ही मुकुट बनाएंगे।

 सर्प का मौर , विवाह का अर्थ होता है, संसार से अपना संबंध जोड़ना, भगवान शिव अपने सिर पर सर्प का मौर स्वीकार करते हैं मानो वे समाज को बताना चाहते हैं की देखो जब संसार से जुड़ो तो सदा सर्वदा इस बात का ध्यान रखो कि कॉल सिर पर बैठा हुआ है इस बात को सदा ध्यान रखो।


दो बातन को भूल मत जो चाहै कल्यान ।

नारायण एक मौत को दूजे श्री भगवान ।।


संसार से संबंध जोड़ने जा रहे हैं तो सदा इस बात का ध्यान रहे सदा सर्वदा कॉल हमारे सिर पर है। इसलिए भगवान का स्मरण बना रहना चाहिए। जटा का मुकुट है। 

भगवान का एक गण गया, चिता की भस्म ले आया, चिता की भस्म को भोले बाबा के पूरे शरीर में मालिश कर दिया, भगवान शिव को यह भस्म बड़ी प्रिय है। भोलेनाथ को चिता भस्म इतनी प्रिय क्यों है ? एक बार कुछ लोग मुर्दे को कंधा देकर जा रहे थे और सब कह रहे थे राम नाम सत्य है भोले बाबा ने सुन लिया, भोले बाबा ने कहा अरे वाह , यह तो अपने ही दल के मालूम पड़ते हैं, भैया ,अरे मेरा भी नारा है

       सत हरि भजन जगत हरि सपना।

और ये सब भी कह रहे हैं राम नाम सत्य है तो यह तो अपने ही दल के मालूम पड़ते हैं ।भोलेनाथ उन्हीं के संग में लग गए, अब जिन लोगों ने उस शव को कंधे पर रखा था श्मशान घाट पर ले कर गए और फिर जैसे ही मुर्दे को आग लगाई गई चिता जलने लगी वैसे ही जो लोग राम नाम सत्य कह रहे थे। वही लोग चाय की दुकान पर चाय पीने लगे। और आपस में कह रहे हैं, तुमको कैसे पता चला कि ये मर गया, एक ने कहा अरे मुझे अचानक सूचना मिली मैं अपनी दुकान बंद करके आया हूं इसके चक्कर में, एक ने कहा अरे रहने दे मेरे घर में पुताई का काम चल रहा था पुताई का काम आधे में छोड़कर पीछे-पीछे चला आया, एक ने कहा अरे तुम अपनी सुनावोगे अरे मेरी तो सरकारी नौकरी है आजकल वैसे भी अंगूठे का सिस्टम हो गया है तो मैं तो सरकारी नौकरी छोड़ कर आया हूं और हद तो तब हो गई जब एक ने कह दिया अगर मरना ही था तो संडे को नहीं मर सकता था ! 

भोले बाबा ये सारी बातों को सुन रहे थे अरे राम-राम जिसको मैं अपने दल का समझ रहा था वे तो दूसरे दल के मालूम पड़ रहे हैं जैसे ही चिता में आग लगाई, इनकी तो विचारधारा ही बदल गई। ये मेरे दल के नहीं हो सकते, किन्तु धन्य है ये शव जिसके कारण  राम नाम का प्रचार तो हुआ , यह धन्य है ।  भोले बाबा, दौड़े-दौड़े गए जो चिता जल रही थी उसकी राख को अपने शरीर में लपेट लिया और कहने लगे जीते जी भले ही राम नाम न ले सका, लेकिन मरने के बाद इसके वजह से कम से कम लोगों ने तो राम नाम का आश्रय लिया इसलिए धन्य है ये, इसके समान कौन हो सकता है ? तो भोले बाबा ने उस चिता भस्म को अपने शरीर में लपेट लिया।

    “चिताभस्मालेपो”      इसीलिए भगवान को चिता भस्म अति प्रिय लगती है । भोले बाबा चिता भस्म लगा करके तैयार हो रहे हैं। गणों ने कहा सरकार तैयार हो गए हो तो एकाद बढ़िया वाहन मंगाए वीआईपी कोई गाड़ी बुलाए दूल्हा सरकार उसमें बैठकर जाएंगे , भगवान ने कहा नहीं नहीं मैंने जीवन भर बैल की सवारी की और अगर आज विवाह के अवसर पर मैं बैल को त्याग दूंगा, तो क्या सोचेगा, वाह भोलेनाथ जीवन भर मेरी सवारी की और सौभाग्य का अवसर आया तो मुझे छोड़कर किसी और की सवारी कर ली। इसलिए मेरा तो सिद्धांत है जिसको मैंने जीवन भर अपने साथ रखा है सौभाग्य के अवसर पर भी मैं उसको साथ लेकर जाऊंगा। इसलिए भोलेबाबा बैल पर बैठे, अच्छा बैठ कैसे रहे हैं ? बैल के पूछ की ओर भोले बाबा का मुख है, उल्टे बैठ रहे हैं । क्यों ? क्योंकि इस विवाह में भोलेनाथ के इष्ट भगवान नारायण भी पधारे हुए हैं और अगर भोलेनाथ सीधे बैठते हैं तो भगवान की तरफ उनकी पीठ हो जाती, इसलिए भगवान शिव ने सोचा, मैं संसार की ओर पीठ भले ही दिखा लू, पर मैं अपने राम को पीठ नहीं दिखा सकता हूं। संसार की ओर भले ही मेरी पीठ हो जाए फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन राम जी की ओर मेरा मुख होना चाहिए ।


 भगवान की ओर अगर मुख होगा तो संसार की तरफ पीठ हो जाए तो भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । हम परमात्मा के  सन्मुख हो, भोलेबाबा बैल पर बैठे।


 बारात का प्रस्थान


 अब भगवान की सुंदर बारात चल रही है, आइए हम सब भी इस बारात में सम्मिलित हो।

                      देखिए ये जो भगवान का श्रृंगार है  ये हंसी मजाक के लिए नहीं है। जीवन का दर्शन इस श्रृंगार में भरा पड़ा  है, लेकिन दिखाई उन्हीं को पड़ता है जो देखना चाहते हैं तो भोले बाबा इस दिव्य श्रृंगार को लेकर चल रहे हैं। भगवान विष्णु आए, विष्णु भगवान ने भोलेनाथ को देखा तो कहने लगे अरे राम राम दूल्हा इतना सुंदर है और बाराती दूल्हे के अनुकूल नहीं है इसीलिए कहते हैं “विलग विलग होइ चलहु सब ।” इसलिए सब विलग विलग होकर चलो, अलग अलग होकर चलो 

 सही बात है भगवान शिव है परमार्थी और देवता है स्वार्थी। स्वार्थी अगर परमार्थी के संग चलेगे तो कहां शोभा बनेगी, महाराज परमार्थी के संग तो नवधा भक्ति चलेगी इसलिए भोलेनाथ ने कहा जाओ मेरे निज समाज को बुलाओ, श्रृंगी दौड़ा-दौड़ा गया किसी कुएं में झांक कर कहा, जितने भूत प्रेत है सब चलो भोले बाबा की बारात में जल्दी , और भूत प्रेत दौड़ पङते हैं और कहते हैं धन्य हो मेरे भोलेनाथ, संसारियो को पता चल जाए हम घर में हैं, तो बोतल में बंद करवा के जमीन में गढ़वा देते हैं। और धन्य है हमारे भोले बाबा का स्वभाव अपने बारात में हमको सम्मिलित कर रहे हैं। सारा समाज भोलेनाथ का एकत्रित हो गया और कैसा अद्भुत समाज है।


“ भोलेनाथ की अद्भुत बारात ”



        कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू ।

        बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू ॥

        बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना ।

          रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥


और नवी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके मुख नहीं है,कोई सृकाल के जैसा है, कुत्ते के जैसा है, सूअर के जैसा है वे नवी पंक्ति में चल रहे हैं जानते हैं यह नौ पंक्तियां कौन-कौन है यह साक्षात नवधा भक्ति ही नव पंक्तियों में विभक्त करके श्रद्धा और विश्वास के परिणय की साक्षी बनने के लिए जा रही हैं। नवधा भक्ति ही नव पंक्तियों में विभक्त है।

 “ कोउ मुख हीन” ये श्रवण भक्ति है। श्रवण के लिए कानों की आवश्यकता होती है मुख की। नहीं होती है। 

“ विपुल मुख काहू।” ये कीर्तन भक्ति है कीर्तन करने के लिए जितना मुख हो उतना ही आनंद आता है। हम लोग इतने लोग बैठे हैं कितना आनंद आता है। तो दूसरी पंक्ति मैं भोलेनाथ का जो समाज चल रहा है जिनके बहुत से मुख हैं ये कौन सी भक्ति है ? ये कीर्तन भक्ति है।

“ विनु पद कर ” तीसरी पंक्ति में वो चल रहे हैं, उनके हाथ पैर नहीं है।ये स्मरण भक्ति है । स्मरण करने के लिए हाँथ पैर की आवश्यकता थोड़ी पड़ती है।


चौथी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके “ बहु पद बाहु ” जिनके बहुत से हाथ पैर हैं ये “ पाद सेवन भक्ति” है भगवान के पाद सेवन करने के लिए जितना हाथ पैर हो उतना ही कम लगता है। लगता है ना की ठाकुर जी की सेवा करने के लिए और दस हाथ होते तो कितना आनंद आता।


“ विपुल नयन” किसी के बहुत से नेत्र हैं यह अर्चन भक्ति है भगवान का अर्चाविग्रह निहारने के लिए लगता है की हजार आंखें मिल जाए तो आनंद आ जाए।


“ कोऊ नयन विहीना।” यह वंदन भक्ति है जब हम भगवान को निहारते हैं तो आंखें खुलती हैं। लेकिन जब हम भगवान को प्रणाम करते हैं तो आंखें बंद हो जाती हैं। यह वंदन भक्ति के प्रतीक हैं।

”  रिष्ट पुष्ट ” जो बहुत मोटे ताजे हैं ये कौन सी भक्ति है ?

      

     श्रवणं किर्तनं विष्णो स्मरणं पाद सेवनम् ।

     अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्य आत्मनिवेदनं ।।


      यह दास्य भक्ति है सेवक जितना ही मोटा ताजा हो उतना ही सेवा करेगा।जब सेवक ही दो हड्डी का है तो भला सेवा क्या करेगा ?जो रिष्ट पुष्ट  हैं वो किसके प्रतीक हैं ? ये दास्य भक्ति के प्रतीक हैं।


और अंत में नवी पंक्ति में वो चल रहे हैं जिनके मुख नहीं है,कोई सृकाल के जैसा है, कुत्ते के जैसा है,कोई सूअर के जैसा है ये आत्मनिवेदन भक्ति है । “जब अपने आप को ही प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया तो क्या फर्क पड़ता है कि हमारा मुख कैसा है ? तो ये नवधा भक्ति ही पार्वती माता के विवाह में सम्मिलित होने जा रही है। इसलिए नारायण भगवान कहते हैं अलग अलग होकर चलो, शिवजी परमार्थी अब शिवजी का समाज है वो चल रहा है। आइए हम भी बड़े प्रेम के साथ भगवान के बारात में सम्मिलित हो। बोलो भक्त वत्सल भगवान की जय।।

  भोले बाबा अपने विचित्र बारातियों को संग में लेकर के हिमाचल नगर की ओर प्रस्थान कर रहे हैं ।

            इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना ।  

 हिमांचल महाराज ने बहुत सुंदर व्यवस्था करी।

          अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥ 

देवता सब अपना - अपना समाज ले करके आ रहे हैं सबसे पहले आज इंद्र अपने समाज को लेकर पहुंच गए हैं अब इधर आगवानी करने के लिए बालक, वृद्ध बारात को देखने के लिए खड़े हैं, बालक दौड़ पड़े, बालकों ने जब इंद्र की शोभा को देखा। बालक सब कहने लगे भैया हो न हो  दूल्हा सरकार यही लगते हैं, देखो तो कितने सुंदर लग रहे हैं, एक ने कहा चलकर पूछो तो सही ऐसे ही मन में थोड़ी ना निर्णय करना चाहिए। अच्छा ठीक है बच्चे सब दौड़ते - दौड़ते  देवराज इंद्र के पास आए और पूछने लगे महाराज कृपा करके बताना दूल्हा सरकार आप ही हैं क्या ? देवराज इंद्र ने कान में हाथ रख लिया और कहा अरे बच्चों ये क्या कह रहे हो? मैं दूल्हा सरकार नहीं हूँ । तो आप कौन हैं?  देवराज इंद्र ने कहा मैं दूल्हा सरकार का  दासानुदास हूँ । बच्चे कहते हैं वाह जब दूल्हे का सेवक इतना सुंदर है तो दूल्हा सरकार कितने सुंदर होंगे? देवराज ने कहा वो कितने सुंदर हैं वो आएंगे देख लेना कितने सुंदर हैं ? भगवान जाने उनके आने के बाद  पानी भी मिले या न मिले ? देवता सब जनवासे  की ओर गये और इतने में बालकों ने देखा सर्वांग सुंदर भगवान नारायण का सुंदर समाज चला आ रहा है।

         

              हियँ हरषे सुर सेन निहारी । 

              हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥


जब भगवान लक्ष्मीपति नारायण का दर्शन किया,तो बच्चे बोल पड़े इनसे सुंदर संसार में कोई हो नहीं सकता, हो ना हो दूल्हा सरकार यही हैं, 

 तो जो सयाने थे उन्होंने कहा अरे मन से मत बोलो, जरा जाकर पूछो तो सही, तो बच्चे दौड़े दौड़े आते हैं सरकार बुरा मत मानना एक बात बताओ, दूल्हा सरकार आप ही हो क्या ? भगवान नारायण ने कहा अरे बच्चों क्या बात करते हो, मैं दूल्हा सरकार नहीं हूँ तो आप कौन हो महाराज ? भगवान बोले मैं तो दूल्हा सरकार का मित्र हूँ,  बच्चे कहते हैं वाह जब मित्र इतने सुंदर हैं तो हमारे सरकार कितने सुंदर होंगे ? भगवान ने कहा वो पीछे खड़े हैं, उनसे बच जाना, तब मेरे पास आना, नारायण तो चले गए जनवासे की ओर। इतने में भगवान शिव का वो विकराल समाज भूत, प्रेत, डाकिनी, पिशाचिनी विचित्र बोल बोल रहे हैं। अब भूत हैं तो भूतइ के भाषा में तो बोलेंगे।


    नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।

देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥


सब नाच रहे हैं, गा रहे हैं, सब विचित्र भाषा में बोल रहे हैं, और भोलेनाथ के गुणों का गान कर रहे हैं, क्या बोल रहे हैं ?

     

       बम्बम बम्बम बोलों जय शिव,जय शिव .......


 भूत प्रेत सब जयकारा लगा रहे हैं अब आगवानी  करने वालों ने जैसे ही भगवान का वह विकराल रूप देखा, भाग चले सब के सब, जितने हाथी, घोड़ा थे वह तो ऐसे भागे महाराज की दूर-दूर तक नजर ही नहीं आयें, विचित्र वह समाज ,और हद तो तब हो गई देखो  भगवान के समाज में देश से भी भूत आए हैं और विदेश से भी आए हैं। ऐसे थोड़ी ना है कि भारत से ही आए हैं भूत सारे विश्व से आए थे, अंतर इतना ही था जो भारत से आए थे वह तो हर हर हर कह रहे थे और जो विदेश से आए थे वह हाय हाय कर रहे थे अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता का असर भूत - प्रेतो पर भी था।

  आगवानी करने वाले बोले हे भगवान, ये कैसी बारात है ? और हद तो तब हो गई जब एक बाराती आगवानी करने वाले के पास आकर कहता है। हमारे ठहरने की व्यवस्था कहां है ? और जब उसने विचित्र भाषा में बोला तो वह थर-थर कांपने लगा और बोला महाराज आप जहां ठहर जाओ वही व्यवस्था है। तुम्हें कौन ठहरा सकता है ? महाराज हमारे पास इतनी व्यवस्था नहीं है कि हम तुम्हें ठहरा पाएं, तुम जहां ठहर जाओ वही तुम्हारी व्यवस्था है, जो करो वही इंतजाम, सारे भूत-प्रेत आनंद कर रहे हैं और सब बच्चे घर चले आए।

               माताओं के पास आए तो माताओं ने बच्चों से पूछा कि बेटा बारात कैसी है, बच्चों ने कहा माँ वह बारात नहीं है, साक्षात यमराज की सेना है, अच्छा तो दूल्हा कैसा है बच्चे कहते हैं, वह साक्षात यमराज है हमारा परम सौभाग्य है हम जीवित बच गए । तुम तो बारात देखने जाना नहीं अगर उस बारात का दर्शन किया तो जीवित नहीं बचोगी तो माताएं बच्चों को समझाती हैं देखो घबराने की जरूरत नहीं है । यह साक्षात भोलेनाथ का विवाह है और भोलेनाथ के विवाह में तो यह सब होता ही रहता है । बच्चों ने कहा खूब दे दो उपदेश, जब पङोगी सामने तब पता चलेगा, अभी खूब उपदेश करो। 

यही माताएं मैना जी के पास गई और मैना जी ने सुंदर आरती की थाल सजायी और भगवान भोलेनाथ के सामने मैना जी सुंदर आरती  की थाल लेकर पहुंच गई और सखियां सुंदर-सुंदर गीत गा रही है। मैना जी आरती उतारे तो कैसे ? भोले बाबा उल्टे बैठे हैं अब भोलेनाथ की पीठ मैना जी को दिखाई पड़ रही है, तो आरती उतारे तो कैसे उतारे ? भगवान शिव का एक गण था, उसने कहा देखो भगवान की आरती उतारनी तो एक काम करो, बैल को उल्टा करो भोलेनाथ अपने आप सीधे हो जाएंगे । अब बैल को उल्टा करने से पहले बैल की पूजा की गई अक्षत, हल्दी लगाया गया, भोलेनाथ प्रसन्न हो गए की मेरी पूजा हो ना हो मेरे नंदी की तो पूजा हो गई यही पर्याप्त है। जैसे बैल को उल्टा घुमाया तो भोलेनाथ सीधे हो गए, मैना जी ने आरती थाल ऊपर उठाई भगवान के सिर पर मणिधर सर्प है। सर्प को आग से बड़ा भय लगता है लेकिन भगवान का स्वभाव पा गया है। सर्प पीछे हो गया, सर्प ने सोचा एक बार  क्षमा कर देते हैं और जब दोबारा मैना जी ने आरती की थाल उठाई, सर्प को ऐसा क्रोध आया जो फुस्सकार  लगाई और मैंना जी हड़बड़ा कर भोलेनाथ को देखा, ऐसा विकराल रूप, थाली ही भगवान के ऊपर पटक दिया और दैया - मैया करती हुई भागी।

                      हे भगवान ऐसा विकराल दूल्हा, जितनी माताएं थी, सब अपने-अपने घर के दरवाजा बंद कर लिये हैं । इससे बड़ा क्या, दूल्हे का आपमान हो सकता है। लेकिन धन्य है भगवान भोलेनाथ,जो अभी भी उसी आनंद में है । देवता भोलेनाथ के पास आए और बोले महाराज आप का ऐसा अपमान हमसे देखा नहीं गया, भोले बाबा ने कहा अच्छा मेरा अपमान भी हो गया क्या, अरे धन्य है भोलेनाथ इतना बड़ा अपमान हो गया, आपको दिखाई नहीं पड़ा क्या,  , देवताओं ने कहा सरकार आपको देखकर माताओं ने अपने-अपने घर के किवाड़ बंद कर लिये , क्या ये अपमान नहीं है ?

 भोले बाबा ने कहा अरे राम-राम मुझे लगा, इस देश की परंपरा है की दूल्हे को देखकर जितनी माताएं हैं अपने अपने घर के दरवाजे बंद कर लेती हैं। मुझे क्या पता ? देवताओं ने कहा धन्य हैं महाराज अरे आपको देखकर दीपक बुझ गया ये आपका अपमान नहीं है ?

 भगवान शिव ने कहा देवताओं जिसके सिर पर द्वितीया के चंद्रमा विद्यमान हो, उसे देखकर दीपक बुझे नहीं तो क्या होगा, मुझे दीपक दिखा रही हैं मेरे सिर पर ही द्वितीया का चंद्रमा विधमान है दीपक को बुझना ही पड़ेगा।

 अरे महाराज आप को देख कर पानी का पात्र गिर गया, जल से भरा पात्र गिर गया आपका अपमान नहीं हुआ ?

 भोले बाबा ने कहा देवताओं जिसके सिर से गंगा रुपी राम भक्ति की धारा प्रगट हो रही हो तो उसे कोई लोटे से जल देगा, तो क्या होगा।

 देवताओं ने कहा धन्य हो महाराज आपको देखकर आप की सासु मां डर गई, भोले बाबा ने कहा यही तो बात है,  मेरी सासु मां मुझे देखकर नहीं डरी, इस सर्प को देखकर डरी, जीव जब काल की ओर देखता है तो भयभीत हो जाता है और जब महाकाल की ओर देखता है तो निर्भय हो जाता है।

               मेरी सासु मां ने अगर मुझे देखा होता तो निर्भय हो जाती वह तो भयभीत इसलिए हुई की मुझे ना देख कर इस सर्प की ओर देखा। धन्य है सरकार आपको मान - अपमान से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। 


इधर मैना जी को शोक हुआ, नारद जी महाराज आए, नारद जी ने छण भर में भय समाप्त किया और मैना जी  से कहा,  मैना जी, जिसको आप अपनी बिटिया समझ रही हैं असल में वो आपकी बिटिया नहीं है। वो सारे जगत की मां है।


“ भोलेनाथ का विवाह ”



            मयना सत्य सुनहु मम बानी । 

            जगदंबा तव सुता भवानी ॥



जिसको आप अपनी बिटिया समझ रही हो न ये सारे जगत की मां है इसलिए उसका भार अपने ऊपर लेने की आवश्यकता नहीं है,अपना भी भार उन्हीं के चरणों में समर्पित कर दो कल्याण जाएगा।

           सारा विषाद समाप्त हुआ। भूत प्रेतों ने कहा महाराज हम तो अब पहले भोजन करेंगे, विवाह होवे या ना होवे बात की बात है। दूल्हे को देखकर सासु मां मूर्छित हो गई, कहीं फेरे के समय माता जी मूर्छित हो गई तो हम बिना भोजन के ही रह जाएंगे इसलिए पहले शिव जी के गणों ने भोजन किया, जेवनार हुआ और शिव जी के गणों को बहुत सुंदर भोजन कराया जा रहा है, बड़ा आनंद रहा है। अब देखिए, “ कोऊ मुखहीन विपुल मुख काहू ” बिना मुख वाले व्यक्ति के सामने, पत्तल परोसने वाले ने सोचा कि इसको पत्तल क्या परोसे ? यह सोच कर आगे चला गया और जब आगे चला गया तो पीछे से आवाज आती है हम यहां हैं अब वह घूम- घूम के देखें, यह बोल कौन रहा है ? उसके बगल में एक बहुत मुख वाला बैठा था उसने कहा अरे भैया तुम मेरे बगल वाले को पत्तल नहीं परसे वह तुम्हें बुला रहा है। परोसने वाले ने सोचा यह खाएगा कैसे इसके मुख ही नहीं है। बहुमुखी वाला बोला देखो यह उसकी समस्या है तुम्हारी नहीं तुम तो पत्तल परोसो उसके सामने। तो पत्तल परोस दिया ।

 दूसरे के पास गया ,उसके बहुत से मुख थे, बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो एक बार गलती कर दे तो दुबारा न करें। तो उसने  जितने मुख थे उतने ही पत्तल परोस दिये, परिक्रमा लगाकर के लो महाराज खाओ ।

एक व्यक्ति खीर लेके आया वह इतना डरा हुआ था की उसने दूर से बांस में करछुल बांधकर दूर से ही खीर परोसने लगा लो खाओ ।

उसने सोचा अगर झपटे तो केवल डंडा ही जाएगा हाथ तो सलामत रहेगा, क्या आनंद हो रहा है बहुत आनंद हो रहा है बड़ी प्रेम से भोलेनाथ का विवाह संपन्न हो रहा है माताएं गा रही है ।

             सुंदर जेवनार हुआ फिर भोलेनाथ का सुंदर विवाह 


 भोलेनाथ ब्राह्मणों को प्रणाम करके सुंदर आसन पर बैठे हैं। साक्षात वेद ही ब्राह्मण के रूप में बैठे हैं। शिव पार्वती का विवाह संपन्न कर रहे हैं। बड़े प्रेम से माता पार्वती और भोलेनाथ का विवाह संपन्न हुआ। देवताओं ने जय जयकार किया।


         हर गिरिजा कर भयउ बिबाहु । 

         सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥


भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह बड़े प्रेम से संपन्न हुआ। बोलिए शंकर भगवान की जय, पार्वती मैया की जय

      बड़े प्रेम के साथ माता पार्वती और शिव का विवाह संपन्न हुआ। विदाई का अवसर सजल नेत्रों से मैंना जी ने पार्वती मैया को विदा किया और पार्वती मैया से कहा बेटी सदा सर्वदा शंकर जी के चरणों की सेवा करना।


          करेहु सदा संकर पद पूजा । 

          नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥


बहुत सुंदर शिक्षा दी, मां पार्वती विदा होकर कैलाश पर्वत पर आई। कैलाश पर्वत पर माता पार्वती और भगवान शिव की अलौकिक सोभा है। बहुत दिनों तक भोलेनाथ ने -


          करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा । 

          गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥


कालांतर में स्वामी कार्तिकेय जी का जन्म हुआ जिन्होंने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया गोस्वामी जी कहते हैं।


शिव विवाह प्रसंग की फलश्रुति -


यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।

कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं ॥


जो भी लोग भगवान शिव और माता पार्वती के पावन परिणय को सुनते हैं उनके घर पर सदा उत्साह ही उत्साह बना रहता है । ऐसे भगवान की कृपा से हम लोगों ने बड़े प्रेम से भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की चर्चा को श्रवण किया।



                                                                                  Pandit Tarun Dubey

सोमवार, 22 अगस्त 2022

🌸 अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे करें ,पाप से मुक्ति के उपाय🌸

🌸 अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है...? 🌸💐👏🏻


बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है।




श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ने ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए ।

बोले भगवन - आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते
हैं।
प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन ।

आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने
चाहिए ।

महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप
पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं ।

यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं ।

बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए।

दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए।

तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए ।

चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए ।

पांचवीं यज्ञ है राजन्- भोजन बनाकर अग्नि भोजन, रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी
मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ।

राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे ।

राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है। हमे उसका दोष नहीं लगता ।उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता।

राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि
गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या।
तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं
राजन्

कर्मणा कर्मनिर्हांरो न ह्यत्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात् प्रायश्चितं विमर्शनम् ।।


नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई व्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है।कोई व्यक्ति यम, नियम, आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है।लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्!

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेव
परायणः ।


राजन् केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए को नष्ट करने की सामर्थ्य है ।

इस लिए हे राजन् !----- सुनिए

स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय।
न जाने या स्वास की आवन होय न होय। ।


राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नही ।
इस लिए सदैव हरी का जपते रहो ।

मैं तो जी माहराज आप सबसे यह निवेदन करना चाहूँगा की, भगवान राम और कृष्ण के नाम को जपने
के लिए कोई भी नियम की जरूरत नही होती है कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते, उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

                                           🌹🌿🌹 श्री राधे कृष्णा 🌹🌿🌹




                                                                     Pandit Tarun Dubey

गजकेसरी योग का किस राशि को क्या फल देगा ?


         गजकेसरी योग का किस राशि को क्या फल मिलेगा?

 ज्योतिष में हजारों प्रकार के योगों का उल्लेख मिलता है। उसी में से एक योग है गजकेसरी योग। यह योग मूलतः बृहस्पति और चन्द्रमा के संयोग से बनता है। गज का अर्थ है हाथी और केसरी मतलब सिंह। जिस प्रकार से गज और सिंह में अपार साहस, शक्ति होती है उसी प्रकार से जन्मकुण्डली में गजकेसरी योग होने से व्यक्ति साहस व सूझबूझ के दम पर, उच्च पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सामाज में सम्मानीय होता है। आज हम आपको कुण्डली की लग्न के अनुसार बनने वाले गजकेसरी योग के फल के बारें में बता रहें है।

 

मेष
मेष  लग्न का स्वामी मंगल होता है। मंगल का गुरू व चन्द्रमा दोनों से सम्बन्ध अच्छा रहता है। इस राशि में गजकेसरी योग बनने से जातक साहसी व तर्कशील होता है। शत्रुओं पर विजय पाता है एंव वाद-विवाद में उसे महारथ हासिल होती है। गुरू महत्वाकांक्षा और राजनीति से जुड़ा ग्रह है, इसलिए मेष राशि वालों को गजकेसरी योग राजनीति में भी सफलता दिलाता है। आप कठोर निर्णय लेने में हिचकेंगे नहीं। धन की पर्याप्त मात्रा रहती है।
 

वृष
इस लग्न का स्वामी शुक्र होता है एंव चन्द्रमा तृतीयेश व गुरू अष्टमेश तथा लाभेश होता है। इस लग्न में गजकेसरी योग बनने पर व्यक्ति को धार्मिक कार्याे में रूचि, स्वभाव में सह्रदयता, परोपकार की भावना मन में विद्यमान रहती है। गुरू अगर अच्छी स्थिति में अचानक धन का लाभ एंव भूमि आदि मिल सकती है। चन्द्रमा पराक्रमेश होने के कारण आप-अपने बलबूते पर सफलता प्राप्त करेंगे।

 

मिथुन
इस लग्न में चन्दमा द्वितीयेश है और गुरू सप्तमेश व दशमेश है। गुरू व चन्द्र की युति से बनने वाला गजकेसरी योग काफी लाभकारक सिद्ध होगा। ऐसे व्यक्ति दूसरों का हित करने वाले प्रतिभाशाली होते है। गुरू दशमेश होकर अगर अच्छी पोजीशन में बैठा है तो मिथुन लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग राजनीति के क्षेत्र में सफलता दिलाता है।
 

कर्क
जब कर्क लग्न की कुण्डली में गजकेसरी योग का निर्माण होता है तो जातक विद्वान होता है। ऐसा व्यक्ति जिस क्षेत्र में जाता है, वहॉ लोकप्रिय हो जाता है। संस्कारों से जुड़े ऐसे जातक अपनों को साथ लेकर चलने में विश्वास करते है। ये लोग सत्य का साथ देने में विश्वास करते है। इनकी लगभग हर मनोकामनायें पूर्ण होती है।

सिंह
सिंह लग्न की कुण्डली में बनने वाला गजकेसरी योग बहुत ही फलदायक होता है। यह योग सिंह के समान शक्ति देने वाला होता है। शत्रुओं का नाश करता है, राज सुख दिलाता है, जीवन के प्रति आशावाना बनाता है, घूमने-फिरने का शौकीन बनाता है, प्रकृति के प्रति लगाव बढ़ाता है। इस लग्न में जन्में व्यक्तियों को संसार की आसुरी शक्तियों से लड़ने का जज्बा मिलता है।

कन्या
इस लग्न में जन्में जातकों के लिए भी गजकेसरी योग लाभकारी सिद्ध होता है। जिनकी कुण्डलियों में गजकेसरी होता है, उनमें निर्भीकता, बौद्धिकता, साहस, धार्मिकता, सामाजिकता व न्यायप्रियता आदि होती है। गुरू चतुर्थेश व सप्तमेश होता है और चन्द्रमा लाभ भाव का मालिक होता है। जिस कारण कन्या लग्न में बनने वाले गजकेसरी योग का युवा अवस्था में फल मिलने की सम्भावना रहती है।
 

तुला
तुला लग्न की कुण्डली में गुरू तृतीयेश व षष्ठेश होता है एंव चन्द्रमा दशम भाव का मालिक होता है। इसलिए इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग मिला-जुला फल देने वाला होता है। यह व्यक्ति अपने जन्म निवास दूर-दराज प्रदेश या विदेश में जाकर धन कमाता है। जातक स्वभाव से जिद्दी व तानाशाही प्रकृति का होता है।
 

वृश्चिक
इस लग्न में गजकेसरी योग बनने से व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में कुशल होता है एवं अपनी जुबान का पक्का होता है। साहसी कार्यो में विजय हासिल करता है। ऐसे जातक पुलिस, मेडिकल, आर्मी, वायुसेना आदि क्षेत्रों में उॅचा मुकाम हासिल करता है। ये लोग अपनी सूझबूझ के कारण काफी चर्चित रहते है।
 

धनु
धनु राशि का स्वामी गुरू ग्रह होता है। गजकेसरी योग में गुरू की अहम भूमिका होती है। अतः इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध होता है, लेकिन यदि गुरू बलवान अवसथा में हो तभी पूर्ण फल मिल पायेगा। ऐसा व्यक्ति धार्मिक कार्यो में लिप्त रहने वाला होता है। शिक्षा के क्षेत्र में ये लोग अच्छी प्रगति करते है।
 

मकर
मकर लग्न का स्वामी शनि ग्रह है। शनि और गुरू की आपस में अच्छी मित्रता है। जिस कारण इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग काफी फलदायक माना जाता है। शनि एक नाकारात्मक ग्रह है जिसका अधिक असर इस लग्न में रहता है। यदि इस लग्न की कुण्डली में शनि और गुरू दोनों बलवान है तो इस योग बेहतर फल मिलेगा अन्यथा सामान्य फल मिलेगा।

 

कुम्भ
इस लग्न की कुण्डली में बनने वाले गजकेसरी योग का भी अच्छा फल मिलता है। यह भी शनि की राशि है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया वाली स्थिति बनी रहती है। मित्रों के सहयोग से बड़े कामों में सफलता मिलती है। सोंचे हुये कार्य पूर्ण होते है किन्तु समय लगता है।
 

मीन
मीन राशि बृहस्पति की राशि है। इसलिए इस लग्न में बनने वाला गजकेसरी योग सफलता दिलाने में पूरा सहयोग करता है। ऐसा व्यक्ति धर्म का जानकार होता है, शिक्षा देने वाला गुरू व सामाज की सेवा व एक सही मार्ग दिखाने वाला समाज सुधारक होता है। इस योग वाले व्यक्ति सम्मान व प्रतिष्ठा के भूखे रहते है। समाज की इनकी हर बात को काफी तवज्जो देता है।  




                                                                        Pandit Tarun Dubey

मनुष्य जो कर्म करता है उसका साक्षी कौन है ?

                                                ॐ

                मनुष्य जो कर्म करता है उस का साक्षी कौन है ?

* दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥

भावार्थ:-धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँ तक व्यवहार हैं, जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं॥


मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है।

‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’

पाप और पुण्य

वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो।

मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी

सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं।

सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी हरसमय नहीं रहती; किन्तु रात-दिन और संध्या में से कोई एक तो हर समय रहता ही है। दिशाएं, आकाश, वायु, पृथ्वी, जल सदैव रहते हैं, मनुष्य इन्हें छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता, इनसे छुप नहीं सकता। मनुष्य की इन्द्रियां, काल और धर्म भी सदैव उसके साथ रहते हैं। कोई भी कर्म किसी-न किसी इन्द्रिय द्वारा किसी-न-किसी समय (काल) होगा ही। उस कर्म का प्रभाव मनुष्य के ग्रह-नक्षत्रों व पंचमहाभूतों पर पड़ता है। जब मनुष्य कोई गलत कार्य करता है तो धर्मदेव उस गलत कर्म की सूचना देते हैं और उसका दण्ड मनुष्य को अवश्य मिलता है।

कर्म से ही देह मिलता है

पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है।

कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म (झाड़ी), लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है। यदि जीव कीटयोनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है।

विभिन्न पापयोनियां

इस संसार-चक्र में मनुष्य घड़ी के पेण्डुलम की भांति विभिन्न पापयोनियों में जन्म लेता और मरता है–

–माता-पिता को कष्ट पहुंचाने वाले को कछुवे की योनि में जाना पड़ता है।

–मित्र का अपमान करने वाला गधे की योनि में जन्म लेता है।

–छल-कपट कर जीवनयापन करने वाला बंदर की योनि में जाता है।

–अपने पास रखी किसी की धरोहर को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है।

–विश्वासघात करने से मनुष्य को मछली की योनि मिलती है।

–विवाह, यज्ञ आदि शुभ कार्यों में विघ्न डालने वाले को कृमियोनि मिलती है।

–देवता, पितर व ब्राह्मणों को भोजन न कराकर स्वयं खा लेता है वह काकयोनि (कौए) में जाता है।

दुर्लभ है मनुष्ययोनि

इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्ययोनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है।

इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को भगवान विष्णु की सेवा-आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। भगवान विष्णु के जो-जो स्वरूप हैं, उनकी भक्ति करने से मनुष्य संसार-सागर आसानी से पार कर परमधाम को प्राप्त करता है।

भगवान विष्णु ने बताया संसार-सागर से पार होने का उपाय

भगवान विष्णु ने संसार-सागर से पार होने का उपाय भगवान रुद्र को बताते हुए कहा कि ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ स्तोत्र से मेरी नित्य स्तुति करने से मनुष्य भवसागर को सहज ही पार कर लेता है।

‘जिनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियों के लिए भी दुर्लभ मुक्ति उन भक्तों के हाथ में ही रहती है।’ (नारदपुराण)

भक्तों की गति

भक्त अपने आराध्य के लोक में जाते हैं। भगवान के लोक में कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के समान रूप पाकर वहां रहना सारुप्य-मुक्ति है। भगवान के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। भगवान के श्रीविग्रह में मिल जाना सायुज्य-मुक्ति है।

जिस जीव को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह भगवान की इच्छा से उनके साथ या अलग से संसार में दिव्य जन्म ले सकता है। वह कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। संसार में भगवत्कार्य समाप्त करके वह पुन: भगवद्धाम चला जाता है।

मुक्त पुरुष

मनुष्य बिना कर्म किए रह नहीं सकता। कर्म करेगा तो पाप-पुण्य दोनों होंगे। लेकिन जो मनुष्य सबमें भगवत्दृष्टि रखकर भगवान की सेवा के लिए, उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए और भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है तो उसके कर्म भी अकर्म बन जाते हैं और कर्म-बंधन में नहीं बांधते हैं। वह संसार में रहते हुए भी नित्यमुक्त है।

तत्त्वज्ञानी पुरुष संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। उनके प्राण निकलकर कहीं जाते नहीं बल्कि परमात्मा में लीन हो जाते हैं। सती स्त्रियां, युद्ध में मारे गए वीर और उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं।

गीता में शुक्ल तथा कृष्ण मार्ग कहकर दो गतियों का वर्णन है–

जिनमें वासना शेष है, वे धुएं, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाए जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
जिनमें कोई वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर नहीं लौटते हैं।
पितृलोक

यह एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। एक जीव को पृथ्वी पर जिस माता-पिता से जन्म लेना है, जिस भाई-बहिन व पत्नी को पाना है, जिन लोगों के द्वारा उसे सुख-दु:ख मिलना है; वे सब लोग अलग-अलग कर्म करके स्वर्ग या नरक में हैं। जब तक वे सब भी इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थिति में न आ जाएं, इस जीव को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृलोक इसलिए एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है।

प्रेतलोक

यह नियम है कि मनुष्य की अंतिम इच्छा या भावना के अनुसार ही उसे गति प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी प्रबल राग-द्वेष, लोभ या मोह के आकर्षण में फंसकर देह त्यागता है तो वह उस राग-द्वेष के बंधन में बंधा आस-पास ही भटकता रहता है। वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर बड़ी यातना भरी योनि प्राप्त करता है। इसीलिए कहा जाता है–‘अंत मति सो गति।’  




                                                                    Pandit Tarun Dubey

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

ॐ मनुष्य जो र्कम करता है उस का साक्षी कौन है ?

      🚩🙏 ॐ मनुष्य जो र्कम करता है उस का साक्षी कौन है ?



मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है।

‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’

पाप और पुण्य

वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो।

मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी

सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं।

सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी हरसमय नहीं रहती; किन्तु रात-दिन और संध्या में से कोई एक तो हर समय रहता ही है। दिशाएं, आकाश, वायु, पृथ्वी, जल सदैव रहते हैं, मनुष्य इन्हें छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता, इनसे छुप नहीं सकता। मनुष्य की इन्द्रियां, काल और धर्म भी सदैव उसके साथ रहते हैं। कोई भी कर्म किसी-न किसी इन्द्रिय द्वारा किसी-न-किसी समय (काल) होगा ही। उस कर्म का प्रभाव मनुष्य के ग्रह-नक्षत्रों व पंचमहाभूतों पर पड़ता है। जब मनुष्य कोई गलत कार्य करता है तो धर्मदेव उस गलत कर्म की सूचना देते हैं और उसका दण्ड मनुष्य को अवश्य मिलता है।

कर्म से ही देह मिलता है

पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है।

कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म (झाड़ी), लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है। यदि जीव कीटयोनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है।

विभिन्न पापयोनियां

इस संसार-चक्र में मनुष्य घड़ी के पेण्डुलम की भांति विभिन्न पापयोनियों में जन्म लेता और मरता है–

–माता-पिता को कष्ट पहुंचाने वाले को कछुवे की योनि में जाना पड़ता है।

–मित्र का अपमान करने वाला गधे की योनि में जन्म लेता है।

–छल-कपट कर जीवनयापन करने वाला बंदर की योनि में जाता है।

–अपने पास रखी किसी की धरोहर को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है।

–विश्वासघात करने से मनुष्य को मछली की योनि मिलती है।

–विवाह, यज्ञ आदि शुभ कार्यों में विघ्न डालने वाले को कृमियोनि मिलती है।

–देवता, पितर व ब्राह्मणों को भोजन न कराकर स्वयं खा लेता है वह काकयोनि (कौए) में जाता है।

दुर्लभ है मनुष्ययोनि

इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्ययोनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है।

इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को भगवान विष्णु की सेवा-आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। भगवान विष्णु के जो-जो स्वरूप हैं, उनकी भक्ति करने से मनुष्य संसार-सागर आसानी से पार कर परमधाम को प्राप्त करता है।

भगवान विष्णु ने बताया संसार-सागर से पार होने का उपाय

भगवान विष्णु ने संसार-सागर से पार होने का उपाय भगवान रुद्र को बताते हुए कहा कि ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ स्तोत्र से मेरी नित्य स्तुति करने से मनुष्य भवसागर को सहज ही पार कर लेता है।

‘जिनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियों के लिए भी दुर्लभ मुक्ति उन भक्तों के हाथ में ही रहती है।’ (नारदपुराण)

भक्तों की गति

भक्त अपने आराध्य के लोक में जाते हैं। भगवान के लोक में कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के समान रूप पाकर वहां रहना सारुप्य-मुक्ति है। भगवान के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। भगवान के श्रीविग्रह में मिल जाना सायुज्य-मुक्ति है।

जिस जीव को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह भगवान की इच्छा से उनके साथ या अलग से संसार में दिव्य जन्म ले सकता है। वह कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। संसार में भगवत्कार्य समाप्त करके वह पुन: भगवद्धाम चला जाता है।

मुक्त पुरुष

मनुष्य बिना कर्म किए रह नहीं सकता। कर्म करेगा तो पाप-पुण्य दोनों होंगे। लेकिन जो मनुष्य सबमें भगवत्दृष्टि रखकर भगवान की सेवा के लिए, उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए और भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है तो उसके कर्म भी अकर्म बन जाते हैं और कर्म-बंधन में नहीं बांधते हैं। वह संसार में रहते हुए भी नित्यमुक्त है।

तत्त्वज्ञानी पुरुष संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। उनके प्राण निकलकर कहीं जाते नहीं बल्कि परमात्मा में लीन हो जाते हैं। सती स्त्रियां, युद्ध में मारे गए वीर और उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं।

गीता में शुक्ल तथा कृष्ण मार्ग कहकर दो गतियों का वर्णन है–

जिनमें वासना शेष है, वे धुएं, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाए जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
जिनमें कोई वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर नहीं लौटते हैं।

पितृलोक

यह एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। एक जीव को पृथ्वी पर जिस माता-पिता से जन्म लेना है, जिस भाई-बहिन व पत्नी को पाना है, जिन लोगों के द्वारा उसे सुख-दु:ख मिलना है; वे सब लोग अलग-अलग कर्म करके स्वर्ग या नरक में हैं। जब तक वे सब भी इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थिति में न आ जाएं, इस जीव को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृलोक इसलिए एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है।

प्रेतलोक

यह नियम है कि मनुष्य की अंतिम इच्छा या भावना के अनुसार ही उसे गति प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी प्रबल राग-द्वेष, लोभ या मोह के आकर्षण में फंसकर देह त्यागता है तो वह उस राग-द्वेष के बंधन में बंधा आस-पास ही भटकता रहता है। वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर बड़ी यातना भरी योनि प्राप्त करता है। इसीलिए कहा जाता है–‘अंत मति सो गति।’
🚩🙏 जय माता दी भारत माता की जय 🚩🙏
🚩🙏💐🌸💮🌺🌹🏵🌻🌼🔱



                                                                              Pandit Tarun Dubey

ग्रह शान्ति उपाय.

                                      ग्रह शान्ति उपाय.



आसान उपायों द्वारा ग्रहों की नाराजगी दूर करें -



1)सूर्य- भूल कर भी झूठ न बोलें,सूर्य का गुस्सा कम हो जाएगा । झूठ क्या है झूठ वो है जो अस्तित्व में नहीं है और यदि हम झूठ बोलेंगे तो सूर्य को उसका अस्तित्व पैदा करना पडेगा आश्चर्य की कोई बात नहीं है । ये नौ ग्रह हमारे जीवन के लिए ही अस्तित्व में आये हैं सूर्य का काम बढ़ जाएगा और मुश्किल भी हो जाएगा ।

2)चंद्रमा - जितना ज्यादा हो सके सफाई पसंद हो जाईये ,और साफ़ रहिये भी -चंद्रमा का गुस्सा कम हो जाएगा । चंद्रमा को सबसे ज्यादा डर राहू से लगता है । राहू अदृश्य ग्रह है ,राहू क्रूर है,हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी में राहू गंदगी है । हम हमारे घर को, आसपास के वातावरण को कितना भी साफ़ करें -उसमें ढूँढने जायेंगे तो गंदगी मिल ही जायेगी ,या हम हमारे घर और आस पास के वातावरण को कितना भी साफ़ रखें वो गंदा हो ही जाएगा और हम सब जानते हैं कि गंदगी कितनी खतरनाक हो सकती है और होती है । ज़िंदगी के लिए ,न जाने कितने बेक्टीरिया , वायरस ,जो अदृश्य होते हुए भी हमारी ज़िंदगी को भयभीत कर देते हैं ,बीमार करके ,ज़िंदगी को खत्म तक कर देते हैं , चंद्रमा (जो सबके मन को आकर्षित करता है स्वय राहू के मन को भी) राहू से डरता है । अतः यदि आप साफ़ रहेंगे तो चंद्रमा को अच्छा लगेगा और उसका क्रोध शांत रहेगा , चंद्रमा का गुस्सा उतना ही कम हो जाएगा ।

3)मंगल- यह ग्रह सूर्य का सेनापती ग्रह है भोजन में गुड है । सूर्य गेंहू है रविवार को गेहूं के आटे का चूरमा गुड डालकर बनाकर खाएं खिलाये ,मंगल को बहुत अच्छा लगेगा । सूर्य गेहूं है -मंगल गुड है और घी चंद्रमा है ,अब तीनो प्रिय मित्र हैं तो तीन मित्र मिलकर जब खुश होंगे तो गुस्सा किसे याद रहेगा ।

4)बुध - बुध ग्रह यदि आपकी जन्म पत्रिका में क्रोधित है तो बस तुरंत मना लीजिये । गाय को हरी घास खिलाकर उसको प्रसन्न करना हैं धरती और गाय दोनों शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है । हरी घास जो बुध ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है -बुध ग्रह का रंग हरा है ,वो बच्चा है नौ ग्रहों में शारीरिक रूप से सबसे कमजोर और बौद्धिक रूप में सबसे आगे आगे । बुध घास है जो पृथ्वी के अन्य पेड़ पौधों के मुकाबले कमजोर है बिलकुल बुध ग्रह की तरह , घास भी शारीरिक रूप से बलवान नहीं होती है मगर ताकत देने में कम नहीं अतः बुध स्वरूप ही है । हरी हरी घास से सजी धरती कितनी सुंदर और खुश दिखती है । घास =बुध और धरती = शुक्र इसी तरह गाय हरी -हरी घास खा कर कितनी खुश होती है इसलिए - हरी- हरी घास =बुध ग्रह और गाय और धरती शुक्र इसलिए गाय को हरी हरी घास खिलाएंगे तो दो बहुत अच्छे दोस्तों को मिला रहे होंगे, ऐसी हंसी खुशी के वातावरण में हर कोई गुस्सा थूक देता है और बुध ग्रह भी अपना क्रोध शांत कर लेंगे ।

5)बृहस्पति -चने की दाल parrots को खिलादे , बृहस्पति कभी गुस्सा नहीं करेंगे । चने की दाल पीले रंग की होती है और बृहस्पति भी पीले रंग के हैं ।
बृहस्पति का भी घनत्व सौरमंडल में ज्यादा है और चने की दाल भी हलकी फुल्की नहीं होती पचाने में हमारी आँतों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है ।
तोता हरे रंग का होता है , बुध ग्रह भी हरे रंग का होता है । तोता भी दिन भर बोलता रहता है और बुध ग्रह भी बच्चा होना के कारण बोलना पसंद करता है । अतः तोता =बुध ग्रह और चने की दाल = बृहस्पति ग्रह
बुध ग्रह बृहस्पति के जायज पुत्र और चंद्रमा के नाजायज पुत्र है। बुध के पिता बृहस्पति हैं और बृहस्पति के चंद्रमा अच्छे मित्र हैं और बृहस्पति की पत्नी तारा ने चंद्रमा से नाजायज शारीरिक सम्बन्ध बनाकर बुध ग्रह को जन्म दिया था इस बात से बृहस्पति अपनी पत्नी तारा से नाराज़ रहते है और बुध की माँ से नाराज़ रहने के कारण अपने जायज पिता बृहस्पति से बुध ग्रह नाराज़ रहता है । इस बात से बृहस्पति दुखी रहता है अतः जब तोता जो बुध स्वरूप है जब चने की दाल खाकर पेट भरेगा और खुश होगा तो बृहस्पति को खुशी मिलेगी और गुस्सा तो अपने आप कम हो जाएगा ।

6)शुक्र - यदि नाराज़ हो तो गाय को रोटी खिलाओ .
सूर्य गेहूं है और शुक्र गाय । किस बलवान व्यक्ति को उसके खुद के अलावा कोई और राजा हो तो अच्छा लगता है । शुक्र को भी सूर्य के अधीन रहना पसंद नहीं है अतः जब आप उसके शत्रु सूर्य जो गेहूं को गाय जो शुक्र है को खिलाएंगे तो वो अपने आप ही गुस्सा भूल जाएगा ।

7)शनि- जिस किसी से भी नाराज़ हो तो उसकी पीड़ा तो बस वो खुद ही जानता है । शनि समानतावादी है ,
ये बड़ा है और ये छोटा है ऐसी बातें शनि को क्रोधित कर देती है, क्योंकि शनि सूर्य (राजा ) का पुत्र है और उसके पिता सूर्य ने उसकी माँ का सम्मान नहीं किया इसलिए शनि को अपनी माँ छाया से प्यार होने के कारण सूर्य पर बहुत गुस्सा आता है । किसी का बड़े होने का अहं उनको पसंद नही है। अहंकार छोड़ देने से शनि भगवान का कृपा प्राप्त होता है।



                                                                                Pandit Tarun Dubey 

*कर्मयोग और भक्ति*




     *कर्मयोग  और भक्ति*




कर्मयोग  का भक्ति के साथ योग यह बात प्राचीन काल से चल रही है लेकिन कर्मयोग  मे इतनी 
नम्रता  होनी  चाहिए कि वह भक्त् कीशरण मे जाकर उसका आश्रय ले।और भक्ति को इतना वात्सल्य  होना चाहिए कि कर्मयोग को अपना पोषण दे भक्ति मातृस्थान मे है कर्मयोग लड़का है माता पराक्रम का  कार्य अपने पुत्र के जरिये  कराती  है और स्वमं उसको पोषण देती है।
सत्कर्म  पाप प्रवृति को दबाने  मे समर्थ है परंतु  उसमे पुण्य का अहंकार मिटाने की शक्ति नही है स्वमं सत्कर्म मे यह ताकत  नही कि वह सत्कर्म का अहंकार पैदा न होने दे।सत्कर्म  करने से जो अहंकार पैदा होता है उसे उपासना से मिटाना  है।
उपासना यानि भगवद् भक्ति से चित्त को धोना वह मनुष्य को नम्र  बनाती हैकर्मयोग चित्त का अन्न है और उपासना चित्त का स्नान है अन्न के साथ साथ शरीर मन की स्वच्छता भी जरूरी है अक्सर होता क्या है? कर्मयोग को उपासनामय बनाने के बदले हम उपासना को ही कर्म बनाते है और उपासना को कर्म बनाने से विकर्म  की खूबी चली जाती है।
अहंकार और दंभ छोडकर निष्कपट भाव से उपासना करते है तब चित्त शुद्ध होता है और चित्तशुद्धि ही उपासना का उद्देश्य।




                                                                                 Pandit Tarun Dubey

*ऐसे करें श्रीमद्भागवत कथा -*

*ऐसे करें श्रीमद्भागवत कथा -*



श्रीमद्भागवत की कथा  केवल  एक कथाकार  को व्यासपीठ पर बिठाकर   नहीं अपितु एक साथ दो  विद्वान् कथाविदों से  समझनी  चाहिये ।

एक मुख्य कथाव्यास और दूसरे उनके सहायक  विद्वान् ।

कथा  में  श्रोताओं के  कथाव्यास के साथ   प्रश्नोत्तर होने चाहिये ,  श्रोता लोग प्रश्न करें और दोनों विद्वान्  आपस में मिलकर उनका  समाधान करें ।

 संशय 👈 , पूर्वपक्ष👈, उत्तरपक्ष 👈, सिद्धान्तपक्ष 👈

इस शैली में श्रीमद्भागवत की कथा  वक्ता और श्रोताओं  के मध्य   कथामण्डप में चरितार्थ होनी चाहिये ।

प्रधान श्रोता भी  सनातनधर्मपरायण आस्तिक और ज्ञाननिधि होने चाहिये , तभी तो वे उत्कृष्ट कोटि के  शास्त्रीय  प्रश्न   रख सकेंगे !

फूहड़ नाच गाने करने  के स्थान पर  वेद वेदाङ्गादि के शास्त्रीय  रहस्यों पर गहन विचार कथा में  होना चाहिये ।

अनेक धर्मों की खिचड़ी बनाने वाले,  गंगा गये तो गंगादास , जमुना गये तो जमुनादास ऐसे     छद्म उदारवादी जैसे  मूर्ख और पाखण्डी  कथाकारों से दूर रहना चाहिये ।

                                                          *।। जय श्री राम ।।*


                                                                                      Pandit Tarun Dubey

विवाह-मिलान के साथ शुभ मुहूर्त निर्धारण कैसे और क्यों करें ???*

       *अगर इन तथ्यों को समझ  लें तो कभी विवाह-जीवन असफल नहीं हो सकता।।*




                    *जाने की विवाह-मिलान के साथ शुभ मुहूर्त निर्धारण कैसे और क्यों करें ???*

हिंदुओं में शुभ विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है। वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विवाह कि तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है। विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।

शादी के बंधन में बंधने जा रहे नवयुगल जोडे के लिए सात फेरों के लिए शुभ मुहुर्त का बडा महत्व है। शादी की तैयारियों, मेहमानों के स्वागत, नाच-गाने की मौज-मस्ती में शुभ मुहुर्त की अहमियत को हम अकसर समझ नहीं पाते हैं।

हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो या इस जन्म में अनजाने में बुरे कर्म का परिणाम भोगना पडता है। ऎसी स्थिति में शुभ मुहुर्त, मंत्र जाप तथा दानादि ही रक्षा करते हैं।

ब्रह्मलीन पं. तृप्तिनारायण झा शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाह-विमर्श’ पुस्तक के अनुसार उपरोक्त चरण अनिष्टकारी होते हैं। बाकी के सोलह नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृतिका, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुण्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, घनिष्ठा तथा शतभिषा नक्षत्रों को विवाह के लिए शुभ नहीं माना जाता।

‘ज्योतिष रत्न’ पुस्तक के अनुसार कृतिका, भरणी, आद्र्रा, पुनर्वसु और अश्लेषा नक्षत्रों में विवाह होने पर कन्या छह वर्षों के अंदर ही विधवा हो जाती है। पुण्य नक्षत्र में विवाहित पुरूष अपनी पत्नी का परित्याग कर दूसरी औरत से शादी रचा लेता है। चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वाषाढा नक्षत्र तलाक के कारण बनते हैं।

विशाखा नक्षत्र में विवाहित कन्या अपने पति का परित्याग कर दूसरे पुरूष से पुन: विवाह कर लेती है या गुपचुप यौन संबंध स्थापित करती है। श्रवण, घनिष्ठा तथा अश्विनी नक्षत्र पति-पत्नी में मनमुटाव पैदाकर उनके जीवन को कठिन बना देते हैं। अशुभ नक्षत्रों में हुए विवाह की अधिकतम आयु दस वर्षों की होती है।

नक्षत्रों के अतिरिक्त विवाह मुहूर्तों में लग्न का उचित चुनाव भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुला और वृश्चिक दिन में मकर और धनु राशि में बधिर संज्ञक, मेष-वृष राशि दिन में तथा कन्या-मिथुन और कर्क राशि में अंध संज्ञक होती हैं। कुंभ राशि दिन में और मीन राशि रात्रि में पंगु संज्ञक होती हैं। बधिर संज्ञक राशि में विवाह करने से दरिद्रता, दिन में अगर अंध संज्ञक लग्न हो तो वैधव्य, अगर यह लग्न रात्रि में हो तो संतान की मृत्यु आदि का योग बनता है।

विवाह जीवन भर सुख-शांति को बनाये रखने के लिए किया जाता है, अतएव विवाह का दिन निर्धारण करने से पूर्व शुभ मुहूर्त का चयन करना अनिवार्य है। योग्य पंडित से विवाह की तिथि का निर्धारण कराया जाना चाहिए।

पंडित जी वर-वधू के शुभ-अशुभ ग्रहों का मिलान करके ही विवाह का मुहुर्त निकालते हैं। शुभ मुहुर्त में लिए गए सात फेरे व्यक्ति का दुर्घटनाओं से बचाव करते हैं। विवाह के समय का निर्णय करने के लिए कुंडली में विवाह संबंधित भाव व भावेश की स्थिति, विवाह का योग देने वाले ग्रहों की दशा, अंतर्दशा तथा वर्तमान ग्रहों के गोचर की स्थित देखी जाती है।

विवाह के सही समय के निर्धारण के लिए पंचाग के 5 तत्व तिथि, नक्षत्र, वार, योग व करण मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य व चंद्र पर आधारित महीने, लग्न व राशि के भिन्न-भिन्न योग या युति के साथ मिलाकर विवाह के शुभ मुहुर्त का चयन किया जाता है। मुहुर्त का एक महत्वपूर्ण भाग लग्न है, जिस पर साधारणतया अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। मुहुर्त में बहुत शुभ या अनुकूल बातें ना भी हों, किन्तु यदि लग्न का समय ध्यान से निकाला गया हो, तो वह मुहुर्त के दूसरे अंगों द्वारा आई बाधाओं व दोषों को दूर कर देता है। जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हो, तो वह समय विवाह के लिए वर्जित है। महीने में आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय विवाह के लिए ठीक नहीं है। इस समय से बचना चाहिए। सात फेरों के समय शुभ मुहूर्त का विचार करना आवश्यक हैं।

बृहस्पति के कर्क, सिंह के नवमांश में, स्वयं के नवमांश में तथा मंगल के नवमांश अर्थात् उच्च मित्र क्षेत्री तथा स्वक्षेत्री होने पर विवाह किया जा सकता है। अधिक मास, गुरु और शुक्र के अस्तकाल तथा समय शुद्धि का ध्यान रखते हुए विवाह किया जा सकता है। ऊपर वर्णित दोषों के बावजूद हमारे देश में अधिकांश विवाह अबूझ मुहूर्तों में सम्पन्न होते आ रहे हैं।

विशेष मत तो यह है कि वर और कन्या की कुंडली का समग्र रूप से मिलान किया जाए, जिसमें मंगल दोष, संतान, आयु, आपसी तालमेल, वैधव्य स्थिति, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति, शिक्षा के स्तर इत्यादि पर विशेष विचार करने के उपरांत शुभ नक्षत्र और समय में विवाह किया जाना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए ‘विवाह संस्कार’ का होना अत्यावश्यक होता है। यह संस्कार मनुष्य के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाला होता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-कन्या के चुनाव हेतु उनकी कुंडलियों का समग्रता के साथ अध्ययन किया जाता है। उनके लग्न, नक्षत्र और अष्टकुट मिलान के द्वारा यह तय किया जाता है कि अमुक कन्या अमुक वर के योग्य है, या नहीं? उनके बीच सुखद दांपत्य स्थापित होगा या नहीं? अब प्रश्न उठता है कि तय होने के बाद विवाह किस मुहूर्त में करना चाहिए? क्योंकि मुहूर्त का बहुत बडा प्रभाव भी वर-कन्या के भावी जीवन पर पडता है।

मुहू्र्त शास्त्र के अनुसार शुभ समय पर किये गये कार्यों का प्रतिफल शुभ होता है, इसलिए विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अनिवार्य हो जाता है। सामान्यत: मुहूर्त चयन के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग का अध्ययन किया जाता है परंतु विवाह मुहूर्त के लिए तिथि, वार और नक्षत्रों पर बल दिया जाता है।

इसमें भी नक्षत्र पर विशेष बल दिया जाता है। तिथि, वार पर इसलिए भी अधिक जोर नहीं दिया गया है क्योंकि अशुभ तिथियां किसी खास स्थितियों में काफी शुभ हो जाती है। उदाहरण के लिए चतुर्थी तिथि अगर शनिवार को हो तो सिद्घ योग बन जाता है। यद्यपि पृथक रूप से दोनों ही अशुभ तिथि तथा दिन होते हैं लेकिन नक्षत्रों के साथ ऐसी कोई बात नहीं होती।

विवाह के लिए रोहिणी, मृगाशिरा, मघा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, स्वाति, हस्त, मूल एवं रेवती नक्षत्र माने जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र में विवाह सम्पन्न होने पर दंपति में आपसी प्रेम बढता है और संतान-पक्ष सुदृढ होता है। मृगाशिरा नक्षत्र संतान की प्रगति का कारक होता है और सुखमय लम्बा दांपत्य देता है।

मघा-नक्षत्र सुखी संतान का कारक और हस्त नक्षत्र मान-सम्मान प्राप्त कराने वाला होता है। अनुराधा नक्षत्र पुत्र-पुत्रियां प्रदान कराने वाला होता है। उत्तरा नक्षत्र विवाह के दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्नति देने वाला होता है। स्वाति नक्षत्र विवाह के तुरंत बाद उन्नति कराता है। रेवती नक्षत्र धन-संपत्ति और समृद्घि विवाह के चार साल बाद देता है।

मूल, मघा और रेवती नक्षत्र का चयन करते समय उनके चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मूल और मघा के प्रथम और रेवती के चतुर्थ चरण का परित्याग करना चाहिए।

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**** आइये जाने की किन गुण दोषों का ध्यान रखें, विवाह मुहूर्त निर्धारण में —

विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक करना चाहिए।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुंडलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन प्रस्तुत है।

सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में वर्जित 21 प्रमुख दोष —

पंचांग शुद्धि अभाव, सूर्योदयास्त या गुरु, शुक्रास्त विभिन्न देश के रीति रिवाज को छोड़कर, संक्रांति दिन, पाप षडवर्ग में लग्न होना, विवाह लग्न में छठे शुक्र व अष्टम में मंगल, त्रिविध गणांत, लग्न कारी योग, विकंगत चंद्रमा, वर-वधू की राशि से अष्टम लग्न, विषघटी, दुर्मुहूर्त पाप ग्रह वार दोष, लतादि दोष, ग्रहण नक्षत्र, उल्पात नक्षत्र, पाप विद्ध नक्षत्र, पापयुत नक्षत्र, पाप नवांश व क्रांतिसाम्य (महापाप)।

विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चांद्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है।श्रावण, भाद्रपद एवं आश्विन मास विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह तिथियां द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। प्रतिपदा (कृष्ण), षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह वार सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। रविवार विवाह के लिए उत्तम हैं। विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्र एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं। अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए उत्तम हैं।

विवाह योग प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, धु्रव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए प्रशस्त हैं। विवाह करण बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए प्रशस्त हैं। शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण विवाह के लिए सामान्य हैं। विष्टि करण विवाह के लिए सर्वथा त्याज्य है।

गुरु/शुक्र अस्त विचार गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तो उसे तारा डूबा कहते हैं। इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए त्याज्य है। देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है।

सूर्य दक्षिणायन काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है। यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है।

देव शयन काल में भी विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है। विवाह में विशेष लत्तादि दोष विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं-

“लत्ता पात युति वेध जामित्र बाणपंचक एकार्गल उपग्रह क्रांतिसाम्य दग्धा।”

इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए।

1. लत्ता दोष:— लत्ता दोष एक गंभीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। इसकी दो स्थितियां होती हैं।

2. पात दोष:– सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है। मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण ये 6 पातकी नक्षत्र हैं। ये सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि उस दिन के नक्षत्र में हो, तो पात दोष होता है। इसे चंडायुध दोष भी कहते हैं। यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित है।

3. युति दोष:— विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तो युति दोष होता है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं। यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तो युति दोष का परिहार हो जाता है। शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता। शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है।


युति दोष के शुभ-अशुभ फल इस प्रकार हैं-


4. वेध दोष:—
विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष ओर के 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है।

दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है। इसका फल इस प्रकार है। पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है। रोहिणी-अभिजित, भरणी-अनुराधा, उत्तराषाढ़ा-मृगशिरा, श्रवण-मघा, हस्त – उत्तराभाद्रपद, स्वाति-शतभिषा मूल-पुनर्वसु, रेवती – उत्तराफलगुनि , चित्रा-पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा-पुष्य, पूर्वाषाढ़-आद्र्रा, धनिष्ठा-अश्लेषा, अश्विनी-पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा-कृत्तिका का आपस में वेध होता है।।

यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तो ‘पादवेध’ होता है। पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ चरण दूषित होता है। यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा। यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा।

विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं। पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तो नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है।

‘रवि वेधे च वैधकं, पुत्रशोको भवेत कुजे।’अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध से पुत्रशोक होता है। शनि के वेध से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है। अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए।

5. यामित्र दोष:— विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है। जामित्र अर्थात सप्तम स्थान। विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तो यह दोष होता है। अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है। पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने से जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने से अशुभ फलदायक होता है। सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है।

6. बाण पंचक दोष:— संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है। यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने 5 शेष बचे, तो रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तो चोर पंचक दोष होता है। यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा। यदि रविवार को रोग पंचक लगे तो सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है। ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं। रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है। मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है। लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है। इसमें विवाह नहीं करना चाहिए।

07. एकार्गल दोष:– विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है। इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है। इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं।

8. उपग्रह दोष: — सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तो उपग्रह दोष होता है।

9. क्रांतिसाम्य दोष: — जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है। एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है। विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है। क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है।

साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है। क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है। विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते। अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए। सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है। इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं।।

10.दग्धा तिथि:— सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है।

नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है। इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं। विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं–

****मर्म वेध: लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है।

****कंटक दोष: त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है।

****शल्य दोष: चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है।

****छिद्र दोष: सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है। ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है। वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है। विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है। दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है।

****सिंह-गुरु वर्जित:– सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है। लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है।

****होलाष्टक:— फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं जो कि शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार है। व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है।

गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं।।

विवाह में लग्न शुद्धि दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं। सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है। विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है। विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है। अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं।

इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है। इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है। इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं।

विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं। लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है। सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र भाव 6, 8 या 12 में न हो, तो लग्न शुभ होता है।


****लग्न भंग— मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए। दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हो अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है।

विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वाधि नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो। उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है। वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है।

श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है। इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है।

****कर्तरी दोष एवं परिहार: — विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो कर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है। लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए। लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है। केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है।

****पंगु, अंध, बधिर लग्न:—- तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं। बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है। मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है। पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है। दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है। इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए। किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं। त्रिबल शुद्धि विचार वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है। विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए।

कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए। सूर्य, चंद्र और गुरु की शुिद्ध होने पर ही विवाह शुभ होता है।

**** वरस्य भास्कर बलं:—
विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है। सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है। दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की शुभतासे संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।

विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ किंतु चैथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्ट होने के कारण त्याज्य है। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो पाता है। इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है।

दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह करे। दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है। यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है। स्थानीय समयानुसार दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है। उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है।

दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है। जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है।

विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है। विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है।

**** कन्यायां गुरौ बलं:— कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है। कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है। पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है।

कन्या से पीला दान करा कर विवाह करना चाहिए। चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं होता। अतः कन्या की जन्म राशि से चैथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है।

इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है। मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है। कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है। किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है।

सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए। कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था।

आजकल तो लड़की का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है। इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है। इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है। ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है।

*****विवाहे चंद्रबलं:– श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है। गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है। अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है। चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है। पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है। चैथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है। विवाह पटल के अनुसार चैथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है।

एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं। चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है। विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए।

****सूर्य-चंद्र की युति – यह युति दंपति को दारिद्र्य दुख देती है।

****चंद्र-मंगल की युति – इस युति के फलस्वरूप मरणांतक पीड़ा होती है।

****चंद्र-शुक्र की युति – इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है।

****चंद्र-शनि की युति – यह युति वैराग्य देती है चंद्र-राहु की युति – राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है।

****चंद्र-केतु की युति – यह युति कष्ट प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक  होता है। विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं।

ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है।

व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है। अंग्रेजी शासकों से स्वतंत्रता प्राप्ति के 24 घंटे बाद इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए हमारे महान नेताओं ने शुभ मुहुर्त का बेताबी से इंतजार किया था। यही वजह है कि हमारा देश आज संसार का सबसे बडा गणतंत्र और समृद्धशाली देशों की पंक्ति में गिना जाता है।

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आइये जाने की क्यों किया जाता है कुंडली मिलान???

विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। पुरुष का बाया व स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है। भगवान शिव और पार्वती को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थो में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है।

**** आइये जाने शुभ मूहूर्त के अनुसार विवाह में वर्जित काल —–

वैवाहिक जीवन की शुभता को बनाये रखने के लिये यह कार्य शुभ समय में करना उतम रहता है. अन्यथा इस परिणय सूत्र की शुभता में कमी होने की संभावनाएं बनती है. कुछ समय काल विवाह के लिये विशेष रुप से शुभ समझे जाते है. इस कार्य के लिये अशुभ या वर्जित समझे जाने वाला भी समय होता है. जिस समय में यह कार्य करना सही नहीं रहता है. आईये देखे की विवाह के वर्जित काल कौन से है.:-

1. नक्षत्र व सूर्य का गोचर —–

1. 27 नक्षत्रों में से 10 नक्षत्रों को विवाह कार्य के लिये नहीं लिया जाता है ! इसमें आर्दा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुणी, उतराफाल्गुणी, हस्त, चित्रा, स्वाती आदि नक्षत्र आते है. इन दस नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र हो व सूर्य़ सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर कर तो विवाह करना सही नहीं रहता है.

2. जन्म मास, जन्मतिथि व जन्म नक्षत्र में विवाह —-इन तीनों समयावधियों में अपनी बडी सन्तान का विवाह करना सही नहीं रहता है. व जन्म नक्षत्र व जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र, 16वां नक्षत्र, 23 वां नक्षत्र का त्याग करना चाहिए !

3. शुक्र व गुरु का बाल्यवृ्द्धत्व—-शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिन तक बाल्यकाल में रहता है. इस अवधि में शुक्र अपने पूर्ण रुप से फल देने में असमर्थ नहीं होता है. इसी प्रकार जब वह पश्चिम दिशा में होता है. 10 दिन तक बाल्यकाल की अवस्था में होता है. शुक्र जब पूर्व दिशा में अस्त होता है. तो अस्त होने से पहले 15 दिन तक फल देने में असमर्थ होता है व पश्चिम में अस्त होने से 5 दिन पूर्व तक वृ्द्धावस्था में होता है. इन सभी समयों में शुक्र की शुभता प्राप्त नहीं हो पाती है.गुर किसी भी दिशा मे उदित या अस्त हों, दोनों ही परिस्थितियों में 15-15 दिनों के लिये बाल्यकाल में वृ्द्धावस्था में होते है.

उपरोक्त दोनों ही योगों में विवाह कार्य संपन्न करने का कार्य नहीं किया जाता है. शुक्र व गुरु दोनों शुभ है. इसके कारण वैवाहिक कार्य के लिये इनका विचार किया जाता है.

4. चन्द्र का शुभ/ अशुभ होना—चन्द्र को अमावस्या से तीन दिन पहले व तीन दिन बाद तक बाल्य काल में होने के कारण इस समय को विवाह कार्य के लिये छोड दिया जाता है. ज्योतिष शास्त्र में यह मान्यता है की शुक्र, गुरु व चन्द्र इन में से कोई भी ग्रह बाल्यकाल में हो तो वह अपने पूर्ण फल देने की स्थिति में न होने के कारण शुभ नहीं होता है. और इस अवधि में विवाह कार्य करने पर इस कार्य की शुभता में कमी होती है.

5. तीन ज्येष्ठा विचार—विवाह कार्य के लिये वर्जित समझा जाने वाला एक अन्य योग है. जिसे त्रिज्येष्ठा के नाम से जाना जाता है. इस योग के अनुसार सबसे बडी संतान का विवाह ज्येष्ठा मास में नहीं करना चाहिए. इस मास में उत्पन्न वर या कन्या का विवाह भी ज्येष्ठा मास में करना सही नहीं रहता है ! ये तीनों ज्येष्ठ मिले तो त्रिज्येष्ठा नामक योग बनता है.इसके अतिरिक्त तीन ज्येष्ठ बडा लडका, बडी लडकी तथा ज्येष्ठा मास इन सभी का योग शुभ नहीं माना जाता है. एक ज्येष्ठा अर्थात केवल मास या केवल वर या कन्या हो तो यह अशुभ नहीं होता व इसे दोष नहीं समझा जाता है.

6. त्रिबल विचार—इस विचार में गुरु कन्या की जन्म राशि से 1, 8 व 12 भावों में गोचर कर रहा हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता है.

गुरु कन्या की जन्म राशि से 3,6 वें राशियों में हों तो कन्या के लिये इसे हितकारी नहीं समझा जाता है. तथा 4, 10 राशियों में हों तो कन्या को विवाह के बाद दु:ख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है.गुरु के अतिरिक्त सूर्य व चन्द्र का भी गोचर अवश्य देखा जाता है !इन तीनों ग्रहों का गोचर में शुभ होना त्रिबल शुद्धि के नाम से जाना जाता है.

7. चन्द्र बल—चन्द्र का गोचर 4, 8 वें भाव के अतिरिक्त अन्य भावों में होने पर चन्द्र को शुभ समझा जाता है. चन्द्र जब पक्षबली, स्वराशि, उच्चगत, मित्रक्षेत्री होने पर उसे शुभ समझा जाता है अर्थात इस स्थिति में चन्द्र बल का विचार नहीं किया जाता है.

8. सगे भाई बहनों का विचार—एक लडके से दो सगी बहनों का विवाह नहीं किया जाता है. व दो सगे भाईयों का विवाह दो सगी बहनों से नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त दो सगे भाईयों का विवाह या बहनों का विवाह एक ही मुहूर्त समय में नहीं करना चाहिए. जुडंवा भाईयों का विवाह जुडवा बहनों से नहीं करना चाहिए. परन्तु सौतेले भाईयों का विवाह एक ही लग्न समय पर किया जा सकता है. विवाह की शुभता में वृ्द्धि करने के लिये मुहूर्त की शुभता का ध्यान रखा जाता है.

9. पुत्री के बाद पुत्र का विवाह—पुत्री का विवाह करने के 6 सूर्य मासों की अवधि के अन्दर सगे भाई का विवाह  किया जाता है. लेकिन पुत्र के बाद पुत्री का विवाह 6 मास की अवधि के मध्य नहीं किया जा सकता है. ऎसा करना अशुभ समझा जाता है. यही नियम उपनयन संस्कार पर भी लागू होता है. पुत्री या पुत्र के विवाह के बाद 6 मास तक उपनयन संस्कार नहीं किया जाता है दो सगे भाईयों या बहनों का विवाह भी 6 मास से पहले नहीं किया जाता है।।

10. गण्ड मूलोत्पन्न का विचार—मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या अपने ससुर के लिये कष्टकारी समझी जाती है. आश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वाली कन्या को अपनी सास के लिये अशुभ माना जाता है. ज्येष्ठा मास की कन्या को जेठ के लिये अच्छा नहीं समझा जाता है. इसके अलावा विशाखा नक्षत्र में जन्म लेने पर कन्या को देवर के लिये अशुभ माना जाता है. इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाली कन्या का विवाह करने से पहले इन दोषों का निवारण किया जाता



                                                                                     Pandit Tarun Dubey