कर्मयोग का भक्ति के साथ योग यह बात प्राचीन काल से चल रही है लेकिन कर्मयोग मे इतनी
नम्रता होनी चाहिए कि वह भक्त् कीशरण मे जाकर उसका आश्रय ले।और भक्ति को इतना वात्सल्य होना चाहिए कि कर्मयोग को अपना पोषण दे भक्ति मातृस्थान मे है कर्मयोग लड़का है माता पराक्रम का कार्य अपने पुत्र के जरिये कराती है और स्वमं उसको पोषण देती है।
सत्कर्म पाप प्रवृति को दबाने मे समर्थ है परंतु उसमे पुण्य का अहंकार मिटाने की शक्ति नही है स्वमं सत्कर्म मे यह ताकत नही कि वह सत्कर्म का अहंकार पैदा न होने दे।सत्कर्म करने से जो अहंकार पैदा होता है उसे उपासना से मिटाना है।
उपासना यानि भगवद् भक्ति से चित्त को धोना वह मनुष्य को नम्र बनाती हैकर्मयोग चित्त का अन्न है और उपासना चित्त का स्नान है अन्न के साथ साथ शरीर मन की स्वच्छता भी जरूरी है अक्सर होता क्या है? कर्मयोग को उपासनामय बनाने के बदले हम उपासना को ही कर्म बनाते है और उपासना को कर्म बनाने से विकर्म की खूबी चली जाती है।
अहंकार और दंभ छोडकर निष्कपट भाव से उपासना करते है तब चित्त शुद्ध होता है और चित्तशुद्धि ही उपासना का उद्देश्य।
सत्कर्म पाप प्रवृति को दबाने मे समर्थ है परंतु उसमे पुण्य का अहंकार मिटाने की शक्ति नही है स्वमं सत्कर्म मे यह ताकत नही कि वह सत्कर्म का अहंकार पैदा न होने दे।सत्कर्म करने से जो अहंकार पैदा होता है उसे उपासना से मिटाना है।
उपासना यानि भगवद् भक्ति से चित्त को धोना वह मनुष्य को नम्र बनाती हैकर्मयोग चित्त का अन्न है और उपासना चित्त का स्नान है अन्न के साथ साथ शरीर मन की स्वच्छता भी जरूरी है अक्सर होता क्या है? कर्मयोग को उपासनामय बनाने के बदले हम उपासना को ही कर्म बनाते है और उपासना को कर्म बनाने से विकर्म की खूबी चली जाती है।
अहंकार और दंभ छोडकर निष्कपट भाव से उपासना करते है तब चित्त शुद्ध होता है और चित्तशुद्धि ही उपासना का उद्देश्य।
Pandit Tarun Dubey

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